वो सात दिन...। ये दाग...। अलग कमरे में रहना...देखो अचार मत छूना...। छि:...। गंदा...। माहवारी का जिक्र आते ही नाक-भौं सिकोड़ना...।
झिझक छोड़िए... खुलकर बात करें पीरियड्स पर, जानें- क्या कहती हैं आज की लड़कियां
पूरी दुनिया गलत धारणाओं को तोड़ने में जुटी है...आप पीछे क्यों
देश-दुनिया में पीरियड से जुड़ी गलत धारणाओं को तोड़ने की मुहिम चल रही है। हाइजीन की बात हो रही है। सबसे पहले 2014 में जर्मनी की एक एनजीओ वास यूनाइटेड ने एमएचडी मनाने की शुरुआत की। 270 देश इस अभियान में जुड़ गए। मकसद माहवारी से जुड़े मिथकों को तोड़ना और महिलाओं-बेटियों के स्वास्थ्य पर फोकस करना है। बदलाव भी आ रहा है।
लखनवी युवा भी कहने लगे-ये शर्म गलत है...
सबसे पहले उनकी बात जो कुछ खास कर रहे हैं। खास इसलिए क्योंकि यह युवाओं का ग्रुप है जो वर्जनाओं पर खुलकर बात कर रहा है। ये युवा ‘नो शेम, वो सुर्ख सात दिन’ के नाम से एक ऑनलाइन और ऑफलाइन कैम्पेन चला रखा है। इसका मकसद महीने के उन दिनों होने वाले दर्द और उससे उपजी शर्म को मिटाने की है।
बेटियां बोलीं-
हमें बात करने में शर्म नहीं, आप भी मत करो
स्टूडेंट एवं सदस्य लखनऊ बुक क्लब की स्वाति सिंह का कहना है कि यह एक जैविक यानी बायोलॉजिक प्रॉसेस है। आसान शब्दों में कहें तो यह प्राकृतिक है। इसे इतना असहज क्यों लिया जाता है, समझ में नहीं आता। चुप्पी क्यों, छिपाना क्यों और क्यों छिप-छिप कर दर्द सहना...। पुरुष प्रधान मानसिकता से उबरिए और हमें भी उबरने दीजिए। मैं सबसे पूछती हूं कि क्यों करें हम शर्म। (तस्वीरें में बायें से स्वाती सिंह व आली वर्मा)
वहीं, क्लास नाइन की स्टूडेंट आली शर्मा का कहना है कि जी, मुझे मालूम है, उन सात दिनों में हमें क्या कुछ नहीं झेलना पड़ता। हमारे परिवार की महिलाओं ने भी पुराने समय में टैबूज झेले हैं। वह सिर्फ इसलिए, क्योंकि हाइजीन एंड हेल्थ के बारे में उन्हीं ज्यादा नहीं मालूम था। अब सब जानते हैं। पीरियड्स शर्म की नहीं हेल्थ की बात है।
दसवीं क्लास की स्टूडेंट अग्रिमा सिंह का कहना है कि भला कौन नहीं जानता कि लड़कियां, महिलाएं मेंस्ट्रुएशन के दौर से गुजरती हैं। प्लीज इसको लेकर कोई गलत धारणा मत बनाइए। बिस्तर अलग कर देना, अछूत बना देना, अरे, कौन से दुनिया में जी रहे हैं लोग। मुझे अपने घर में इस पर बात करने में कोई हिचक नहीं। (तस्वीरें में बायें से अग्रिमा सिंह व सना)
दसवीं क्लास की स्टूडेंट सना का कहना है कि गांव ही नहीं शहर में भी अभी लोग टैबूज में उलझे हैं। पीरियड्स में अछूत बना देना, पढ़े-लिखे समाज की सोच हो ही नहीं सकती। यह एक नेचुरल प्रॉसेस है और इसे नेचुरल ही रहने दीजिए।
‘काली पॉलिथीन’ का डर छोडिए
दस्तक मंच की को-ऑर्डिनेटर वीना राना का कहना है कि ‘नो शेम, वो सुर्ख सात दिन...’ दस्तक मंच और वाटर एड की एक संयुक्त मुहिम है। एक मानसिक खीझ, झुंझलाहट झेल रही एक बच्ची या महिला को जबरदस्ती के बंधनों में बांधना छोड़िए यह कोई अपराध नहीं, एक नेचुरल प्रॉसेस है। इसे धर्म की मान्यताओं या गलत धारणाओं की जंजीरों में जकड़ना गलत है।
पीरियड्स, सैनेटरी नैपकिन या इससे जुड़ी चीजें अब हाइजीन एंड हेल्थ का मुद्दा है। अलबत्ता महिलाएं-लड़कियां दुकानों से खुद जाकर पैड खरीदने में झिझकती हैं।....और ले भी लिया तो तुरंत मुंह से यही निकलता है कि काली पॉलिथीन में रख दीजिए। अब तो हाल यह है कि दुकानदार खुद ही काली पॉलिथीन में रखकर देते हैं। यह जान लीजिए कि आप कोई अपराध नहीं कर रहीं, इसलिए काली पॉलिथीन को न कहना सीखिए।