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लुधियाना से किसी तरह पहुंचे लखनऊ, बोले- घर मा नमक-रोटी खा लेइबे मगर परदेश न जइबे

Wed, 20 May 2020 06:55 PM IST
ishwar ashish अभिषेक सहज/अमर उजाला, लखनऊ
अभिषेक सहज/अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Wed, 20 May 2020 06:55 PM IST
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conditions of people coming back from ludhiana, delhi and bengaluru 
रायबरेली के बृजमोहन व अमरनाथ। - फोटो : amar ujala

लुधियाना से रायबरेली : बिजनौर पहुंचे तो साइकिल करा ली जमा... किसी तरह पहुंचे लखनऊ


लुधियाना की एक साइकिल बनाने वाली कंपनी में काम करने वाले बृजमोहन और अमरनाथ के पास जब पैसे खत्म हो गए और खाने तक का कोई जरिया नहीं बचा तो दोनों साइकिल से ही लुधियाना से निकल पड़े रायबरेली के लिए। बृजमोहन बताते हैं कि जब वे बिजनौर पहुंचे तो वहां उनकी साइकिल पुलिस ने जमा करा ली। पुलिस ने कहा, किसी ट्रक में बैठकर निकल जाओ। पूरी रात बिजनौर में ही काटनी पड़ी, सुबह पुलिस ने एक ट्रक में बैठाया, किसी तरह से मंगलवार को सुबह लखनऊ पहुंचे। अमरनाथ बताते हैं कि कंपनी में दो माह से तनख्वाह नहीं मिली। सारा पैसा खत्म हो गया। 13 मई को लुधियाना से निकले तो पास में खाने को कुछ नहीं था। वह बोले, जऊन परेशानी हम झेली है, हमही जानित है कसम खाइत हन कि नमक-रोटी खा लेइबे मगर कबहूं लौटि के परदेस कमाय न जइबे।
 

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तेलंगाना से बस्ती जा रहे मोहित, रवींद्र, दिलीप व रोहित। - फोटो : amar ujala

तेलंगाना से बस्ती : तीन सौ किमी. पैदल चले, शरीर में जान नहीं बची है, बस घर मिल जाए
छह दिन पहले तेलंगाना से निकले करीब 15 युवकों का जत्था मंगलवार को लखनऊ पहुंचा। जत्थे में शामिल मोहित, रविंदर, दिलीप, रोहित ने बताया कि वे लोग बस्ती जा रहे हैं और तेलंगाना में कारपेंटर का काम करते थे। यहां तक आने में कभी ट्रक से सफर किया तो कभी किसी डाले में बैठकर आगे बढ़े। तीन सौ किमी. तो हम लोग पैदल चले, रास्ते में खाने तक को तरस गए। पिछले दो दिन से रास्ते में लोग बिस्कुट, केला वगैरह दे रहे हैं लेकिन अन्न अभी तक नसीब नहीं हुआ। पता चला है कि लखनऊ से बस की व्यवस्था सरकार ने की है, अब बस घर नसीब हो जाए।

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बैंगलोर से बस्ती जा रहे नारायण, इंद्रजीत, लवकुश व लक्ष्मण। - फोटो : amar ujala

बंगलूरू से बस्ती : भूखे ही चलते रहे, छह दिन में पहुंचे लखनऊ
बंगलूरू में टाइल्स लगाने का काम करने वाले नारायण, इंद्रजीत, लवकुश और लक्ष्मण को जब छह दिन बाद लखनऊ पहुंचने पर चावल नसीब हुआ तो वे उस पर टूट पड़े। बोले- कई दिन बाद आज अन्न खाने को मिला। बताया कि बस्ती जा रहे हैं लेकिन रास्ते में जो दुश्वारियां झेलीं, उन्हें बताते हुए ही उनकी आंखों में आंसू भर आए। बोले- बस सकुशल घर पहुंच जाएं तो गंगा नहाएं। इसी बीच खाते हुए बस आ गई और पुलिसकर्मियों ने कहा कि जल्दी बैठो।

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दिल्ली से पटना जा रहे झुनकूराम भतीजे के साथ। - फोटो : amar ujala

दिल्ली से पटना : दिव्यांग चाचा को व्हीलचेयर समेत साइकिल से टोचेन कर ले जा रहा छोटू
बिहार के मूल निवासी 55 साल के झुनकूराम दोनों पैरों से निशक्त हैं। दिल्ली के विश्वासनगर मेें एक कारखाने में काम करते थे। लॉकडाउन के बाद से करीब दो माह से कोई काम नहीं था, वहीं फंसे हुए थे। पैसे भी खत्म हो चुके थे। घर जाने का कोई साधन नहीं था। हिम्मत करके तीन दिन पहले दिल्ली से  भतीजे छोटू के साथ पटना के लिए रवाना हुए। झुनकूराम बताते हैं कि साइकिल से एक रस्सी बांधकर व्हीलचेयर समेत चाचा को लेकर छोटू ने सफर की शुरुआत की। जो कुछ भी थोड़ा सा लइया-चना पास में था, खत्म हो गया। रास्ते में तकरीबन 80 किलोमीटर तक भूखे रहकर दोनों चलते रहे। आगरा के पास कुछ लोगों ने बिस्किट और पानी दिया तो शरीर में कुछ जान आई। रात में भी सफर जारी रहा, जब थक गए तो रास्ते में व्हीलचेयर पर ही चाचा-भतीजे थोड़ी देर के लिए बारी-बारी से सोते रहे क्योंकि डर था कि कहीं कोई साइकिल लेकर न चला जाए। फिर इटावा, औरैया, कानपुर, उन्नाव होते हुए तीन दिन में लखनऊ पहुंचे। झुनकूराम कहते हैं कि इतनी तकलीफ सहन की है, भूखे रहे हैं, बस एक बार घर पहुंच जाएं तो फिर कभी कमाने इतनी दूर नहीं जाएंगे। छोटू बोला, हम जानते हैं कि मंजिल अभी दूर है, करीब 550 किलोमीटर से ज्यादा चल चुके हैं।

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दिल्ली से प्रतापगढ़ जा रहे अजय व उनका परिवार। - फोटो : amar ujala

दिल्ली से प्रतापगढ़ : नहीं बचे पैसे तो बाइक से ही पति-पत्नी 11 माह की बीमार बच्ची के साथ निकल पड़े 
11 माह की बच्ची की तबीयत ठीक नहीं थी, जो पैसे पास में थे वो भी दो माह के लॉकडाउन में धीरे-धीरे खत्म हो गए। जब कोई चारा नहीं नजर आया तो दिल्ली में टैक्सी चलाने वाले अजय पत्नी और बच्ची को लेकर बाइक से ही निकल पड़े। रास्ते में तेज धूप ने कड़ा इम्तिहान लिया तो वहीं रात में रास्ते में असुरक्षा का डर भी रहा। शहीद पथ पर मिले अजय बताते हैं कि वे लोग प्रतापगढ़ में अपने गांव जा रहे हैं। पत्नी बोली, कुछ भी होगा लेकिन अपने घर में भूखे तो नहीं मरेंगे। बोलीं, बस ईश्वर से प्रार्थना है कि ऐसी मुसीबत कभी न आए और किसी तरह से घर पहुंच जाएं।

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