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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   CM Yogi Adityanath and BJP leaders give tribute to late Ashutosh tandon.

स्मृति शेष : भाजपा नेता आशुतोष टंडन का निधन; अब शायद ही दिखे सियासी चटखारों वाली चाट की महफिल

Thu, 09 Nov 2023 09:24 PM IST
ishwar ashish अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Thu, 09 Nov 2023 09:24 PM IST
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CM Yogi Adityanath and BJP leaders give tribute to late Ashutosh tandon.
आशुतोष टंडन उर्फ गोपालजी को श्रद्धांजलि देने पहुंचे मुख्यमंत्री योगी। - फोटो : अमर उजाला

पूर्व मंत्री और लखनऊ पूर्वी विधानसभा क्षेत्र से विधायक आशुतोष टंडन ''गोपालजी'' का बृहस्पतिवार को निधन हो गया। वह 63 वर्ष के थे और कैंसर से ग्रसित थे। मेदांता अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। बृहस्पतिवार दोपहर करीब 12:07 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। गोपालजी के निधन से राजधानी में शोक की लहर है। अस्पताल से उनका शव एंबुलेंस से सीधे भाजपा मुख्यालय ले जाया गया, जहां प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी समेत अन्य पदाधिकारियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। 

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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चौक में सोंधी टोला स्थित गोपालजी के आवास पहुंचे। मुख्यमंत्री के साथ डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक व राज्य सभा सदस्य डॉ. दिनेश शर्मा ने गोपालजी को श्रद्धांजलि अर्पित की और परिवारजन को ढ़ांढ़स बढ़ाया। मुख्यमंत्री ने शोक जताते हुए एक्स पर लिखा कि आशुतोष टंडन ‘गोपालजी’ का निधन अत्यंत दुःखद है। वे एक जनप्रिय, कर्मठ, जुझारू राजनेता के रूप में वे सदैव याद किए जाएंगे। प्रभु श्री राम से प्रार्थना है कि दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्री चरणों में स्थान तथा शोकाकुल परिजनों को यह अथाह दुःख सहने की शक्ति प्रदान करें। गोपालजी मध्य प्रदेश और बिहार के राज्यपाल रहे लालजी टंडन के पुत्र थे। गोपालजी के भाई अमित टंडन ने एक्स पर उनके निधन की सूचना दी।

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छाया एक और सियासी ड्योढ़ी पर वीरानगी का संकट- कई दशक से था परिवार का सियासी दबदबा

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कह सकते हैं कि वह हुबहू पिता लालजी टंडन जैसे नहीं थे । बावजूद इसके लखनवी तहजीब को जिंदा रखने और इस शहर की नींव में दबी भारतीय संस्कृति की धरोहरों तथा मेहमान नवाजी की पिता की परंपरा को जिंदा रखने की फिक्र आशुतोष टंडन उर्फ 'गोपाल जी' में भी कम नहीं दिखती थी । दुर्भाग्य से पिता लालजी टंडन की 2021 में हुई मृत्यु के बाद उन्हें साढ़े तीन साल से भी कम जिंदगी मिली । इसमें भी वह स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझते रहे । बावजूद इसके उनकी कोशिश रही कि बाबू जी यानी पिता लाल जी टंडन द्वारा शुरू की गई परंपराएं निभती रहें । संख्या भले ही पिता लाल जी टंडन जिन्हें लखनऊ ही नहीं प्रदेश के राजनीति में रुचि रखने वाले दूसरे जिलों के लोग भी 'बाबू जी' कहा करते थे, जितनी न हो । पर, चाट और चाय पर सियासी चटखारों वाली महफिलों पर विराम न लगने पाए ।

होली का जुलूस हो या हास्य कवि सम्मेलन । पिता की मृत्यु के बाद उनकी सक्रिय भागीदारी रही । मुलाकात होने पर बीमारी के बावजूद वे इस बात को लेकर भी फिक्रमंद दिखते थे कि 'बाबू जी' यानी पिता लालजी टंडन के रिश्तों की ताजगी बनी रहे । संख्या सीमित रहे । रंग पहले जैसा चटख न रहे । पर, नेताओं से लेकर पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों तथा पार्टी कार्यकर्ताओं से संवाद व संपर्क को तरोताजा रखने वाली चाट व चाय पर पर सजने वाली महफिल किसी न किसी स्वरूप में जीवित रहें । यह सही है कि लोगों को यह शिकायत भी रही कि टंडन जी वाली रौनक गायब हो रही है लेकिन शायद इसकी वजह सिर्फ उनका स्वास्थ्य था । जो उन्हें चाहकर भी उतना सक्रिय नहीं रहने दे रहा था ।

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रिश्तों को संजोया

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तीन बार विधायक और एक बार कैबिनेट मंत्री रहे गोपाल का गंभीर स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों के बावजूद प्रयास रहा कि पिता के जमाने से शुरू की गई हजरतगंज की बैठकी की जीवंतता बनी रहे । उसमे शामिल होने वाले सिर्फ भाजपा के ही नहीं बल्कि पिता के समय की तरह दूसरी पार्टियों के नेता और कार्यकर्ता भी रहें । बिहार और मध्य प्रदेश के राज्यपाल, प्रदेश सरकार में कई बार मंत्री, नेता प्रतिपक्ष, लोकसभा सदस्य रहे लालजी टंडन के पुत्र गोपाल को पिता के बड़े कद और राजधानी के प्रमुख कद्दावर चेहरे होने के नाते सिर्फ भाजपा ही नहीं बल्कि दूसरे दलों के बड़े नेताओं का स्नेह मिला । विद्यार्थी परिषद से जुड़े रहे गोपाल पिता के जनप्रतिनिधि होने वाले दायित्वों में हाथ तो किशोरावस्था से ही बंटाते रहे । पर, उनकी सार्वजनिक सक्रियता 1995 के आसपास शुरू हुई ।

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आने वाला कोई निराश न हो

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प्रारंभ में उनकी भूमिका पिता से मिलने आने वाले लोगों की अगवानी की ही रही । 'बाबू जी' से मिलने आने वाले लोगों को कोई दिक्कत न हो । उनके स्वागत सत्कार में कोई कमी न रहे । गोपाल जी लगातार यह चिंता करते देखे जा सकते थे कि आने वाला जिस अपेक्षा से उनके पिता लालजी टंडन से मिलने आया है । आने वाले को जो ' बाबू जी' ने जो आश्वासन दिया है । उसे बाबू जी के सहयोगी संजय चौधऱी के साथ समन्वय कर पूरा करा दिया जाए । गोपाल के अलावा उनके दूसरे भाइयों सुबोध और अमित की जिम्मेदारी पैतृक व्यापार संभालना ही रही । इस तरह स्व. टंडन यानी बाबू जी के राजनीतिक वारिस गोपाल जी थे ।

टंडन की महफिल के असली मेजबान

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बताने की जरूरत नहीं कि राजधानी की सियासत में खासतौर से भाजपा की राजनीति में स्व. लालजी टंडन का काफी दबदबा था । मुलायम सिंह, नारायण दत्त तिवारी, श्रीपति मिश्र, डॉ. दाऊ जी गुप्त, अखिलेश दास, डॉ. अम्मार रिजवी जैसे तमाम बड़े गैर भाजपा दलों के बड़े सियासी चेहरों का भी इस परिवार से काफी नजदीकी नाता रहा । पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. अरुण जेटली, स्व. सुषमा स्वराज का भी स्व. टंडन के यहां आना जाना रहा । इस नाते गोपाल को भी इन सबका सानिध्य ही नहीं प्राप्त हुआ बल्कि संपर्क व संवाद भी रहा । स्व. लालजी टंडन दावत देने के बड़े शौकीन थे । राजधानी आने वाला भाजपा का शायद ही कोई ऐसा बड़ा नेता होगा जिसने इस परिवार की मेहमान नवाजी का अनुभव न प्राप्त किया हो । दूसरे दलों के नेता भी अक्सर इस परिवार की दावतों में शामिल होते रहते थे । जिनमें गोपाल ही पूरी तरह मेजबानी की भूमिका में दिखते थे । हाथ में दोना या कटोरी लिए और उसमे कोई न कोई खाने-पीने का मशहूर वस्तु रखे हुए उसे खिलाने का आग्रह लोगों को उनसे भी सहजता से जोड़ देता था ।

संस्कृति को सहेजने की फिक्र

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स्व. टंडन कहते थे कि लखनऊ सिर्फ इमामबाड़ों और मकबरों का शहर नहीं है बल्कि इसकी नींव में भारतीय संस्कृति की अतुलनीय धरोहरें भी दबी हैं । इन्हीं धऱोहरों से नई पीढ़ी को परिचित कराने के लिए स्व. लाल जी टंडन ने 'अनकहा लखनऊ' पुस्तक लिखी थी । स्व. लाल जी टंडन ने लखनऊ पर एक और पुस्तक भी लिखना शुरू किया था । पर, उनका निधन हो गया । उनके निधन के बाद गोपाल टंडन ने उनके इस काम को भी आगे बढ़वाया था । पुस्तक पूरी हो पाई या नहीं यह तो ठीक-ठाक नहीं पता लेकिन गोपाल के निधन से न सिर्फ राजधानी के एक और बड़ी सियासी ड्योढ़ी पर वीरानगी के बादल छाते दिख रहे हैं बल्कि चाट और चाय के साथ सजने वाली टंडन घराने की सियासी महफिल में भी बड़ा खालीपन पैदा होने का खतरा खड़ा हो गया है ।

लखनऊ पूरब में होगा उप चुनाव

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लखनऊ पूरब विधानसभा के विधायक आशुतोष टंडन गोपाल के निधन के बाद अब इस सीट पर उप चुनाव कराया जाएगा। 18वीं विधानसभा में यह सातवां उप चुनाव होगा। इससे पहले रामपुर से सपा विधायक आजम खां और रामपुर के स्वार से सपा विधायक अब्दुल्ला आजम को एमपी एमएलए कोर्ट से सजा होने के कारण उनकी सदस्यता रद्द हुई थी। सपा के दोनों विधायकों की सदस्यता जाने से रिक्त हुई सीट पर उप चुनाव हुआ। रामपुर में भाजपा और स्वार में अपना दल एस ने जीत दर्ज की। खतौली में विधायक विक्रम सैनी को मुजफ्फर नगर दंगों में दो वर्ष की सजा होने के कारण उनकी सदस्यता रद्द हुई। खतौली उप चुनाव में आरएलडी ने जीत दर्ज की। मिर्जापुर के छानबे से अपना दल के विधायक राहुल प्रकाश कोल के निधन के बाद छानबे में उप चुनाव हुआ था। उप चुनाव में अपना दल (एस) प्रत्याशी एवं राहुल प्रकाश की पत्नी ने जीत दर्ज की। गोला गोकर्णनाथ से भाजपा विधायक अरविंद गिरी का सितंबर 2022 में निधन हुआ था। नवंबर 2022 में हुए उप चुनाव में बेटे एवं भाजपा प्रत्याशी अमन गिरी चुनाव जीते थे। मऊ जिले की घोसी सीट से सपा विधायक दारा सिंह चौहान के इस्तीफे के बाद वहां उप चुनाव हुआ। उप चुनाव में सपा ने जीत दर्ज की।

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