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केजीएमयू: डाक्टरों ने आंत के टुकड़े से बनाया किशोरी का निजी अंग, अब जी सकेगी शादीशुदा जिंदगी

Mon, 08 Jul 2019 01:48 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क/अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क/अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Mon, 08 Jul 2019 01:48 PM IST
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achievement of professor rahul sinha and dr.vishwajeet singh in KGMU
प्रतीकात्मक तस्वीर

केजीएमयू के चिकित्सकों ने सिग्मॉइड वेजाइनोप्लास्टी के जरिए किशोरी का निजी अंग बनाकर उसकी जिंदगी में खुशियां बिखेर दी हैं। अब वह शादीशुदा जिंदगी जी सकेगी। हालांकि बच्चे को जन्म नहीं दे पाएगी। यह युवती जन्मजात बीमारी एमआरकेएच सिंड्रोम के टाइप-टू से ग्रसित थी। केजीएमयू के चिकित्सकों का दावा है कि एमआरकेएच सिंड्रोम टाइप वन के केस तो तमाम हुए हैं। केजीएमयू में इस केस से पीड़ित एक युवती सर्जरी के बाद बच्चा भी पैदा करने में सफल रही है। लेकिन टाइप-टू कैटेगरी में दुनियाभर में अभी तक सिर्फ दो केस पंजीकृत हैं। यह तीसरा केस है।

achievement of professor rahul sinha and dr.vishwajeet singh in KGMU
प्रो. राहुल सिन्हा - फोटो : अमर उजाला

यह किशोरी दिल, गुर्दा, गला और रीढ़ की हड्डी समेत नौ बीमारियों की चपेट में थी। आयुष्मान योजना का लाभार्थी होने की वजह से यह ऑपरेशन मुफ्त हुआ है। रायबरेली निवासी 15 साल की किशोरी को मासिक धर्म न आने पर परिवारीजनों ने आसपास के अस्पतालों में दिखाया। कई स्थानों पर इलाज कराने के बाद वह केजीएमयू पहुंची। यहां यूरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर विश्वजीत सिंह ने ओपीडी में मरीज को देखा और जांच कराई।

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डॉ विश्वजीत सिंह - फोटो : अमर उजाला
जांच के दौरान वह एमआरकेएच सिंड्रोम (टाइप-टू) से पीड़ित पाई गई। यूट्रस, ओवरी, यूटेरिन ट्यूब वगैरह नहीं थे। प्री एनस्थीसिया चेकअप के दौरान पता चला कि किशोरी के दिल के वॉल्व में भी खराबी है। उसके शरीर में एक ही गुर्दा है। गर्दन छोटी थी और रीढ़ की हड्डी में भी समस्या थी। इस तरह उसके शरीर में वे सभी लक्षण मिले, जो एमआरकेएस टाइप-टू में पाए जाते हैं।

 
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प्रतीकात्मक तस्वीर
ऐसे किया ऑपरेशन
किशोरी के शरीर में मौजूद दो मीटर की आंत से 10 सेंटीमीटर का टुकड़ा लिया गया। उस टुकड़े से करीब डेढ़ घंटे के ऑपरेशन के बाद निजी अंग बनाए गए। आंत के छोटे होने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। डॉ. विश्वजीत ने बताया कि एमआरकेएच सिंड्रोम का पूरा नाम मेयर, टॉकी टेंस की, कुस्टर, हाउसर सिंड्रोम है। इन चारों ने मिलकर इसकी खोज की थी। यह एक जेनेटिक बीमारी है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
टीम में ये रहे शामिल
यूरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. विश्वजीत सिंह के साथ प्रो. राहुल जनक सिन्हा,  रेजीडेंट डॉ. ज्ञानेंद्र, डॉ. मुकेश, डॉ. कौशल, डॉ. विश्वानु, एनस्थीसिया विभाग के डॉ. जिया समेत पैरामेडिकल एवं नर्सिंग स्टाफ मौजूद रहा।
ऐसे पहचाने बीमारी को
प्रो. राहुल जनक सिन्हा ने बताया कि यदि किसी बच्ची में शारीरिक विकास प्रभावित हो, 14 वर्ष की उम्र में मासिक धर्म शुरू न हों, उसकी आवाज बदलने लगे तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। शुरुआती जांच और कुछ सर्जरी के बाद युवती के आंतरिक हिस्से को सुधारा जा सकता है।
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