हमने बचपन से 'अनेकता में एकता' के पाठ को किताबों में ही पड़ा था लेकिन जब देश पर कोरोना नामक विपत्ति आई तो हमने इसको चरितार्थ होते देखा है। लॉकडाउन में भारतीयों ने ऐसी कई सारी चीजें एकसाथ की जिसने हम सभी को एकता के सूत्र में पिरो दिया और यह सूत्र की मजबूती ही है कि आज कोरोना से लड़ते हुए हम इतनी दूर तक आ गए हैं। यह एकता का ही भाव है जिसने हमें इतनी हिम्मत दी कि इस खतरनाक समय में भी हम बिल्कुल नहीं घबराए। आज हम 2020 के अंतिम माह में हैं और भयमुक्त है क्योंकि हम जानते हैं कि इस महामारी में कोई भी अकेला नहीं है बल्कि हम सब भारतीय साथ हैं।
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एक साथ जलाए दीपक
यूं तो साल में हम एक बार दिवाली का पर्व मनाते हैं लेकिन कोरोना ने हमें इस साल दो बार दिवाली मनाने का मौका दिया। जब कोरोना ने देश में दस्तक दी तब शुरुआती दिनों में माननीय प्रधानमंत्री ने घर के बाहर बालकनी में सभी को दीपक जलाने को कहा। पूरे भारत ने इस बात को माना और घरों को जगमग कर दिया। दीपक जलाने से कोरोना तो नहीं भागा लेकिन हमने अपनी एकता की शक्ति को जरूर उस रोज पहचाना।
ताली और थाली बजाई
हम सभी जानते थे कि ताली और थाली बजाने से कोरोना तो नहीं भागने वाला है लेकिन इतना तो जरूर स्पष्ट था कि ताली और थाली के स्वर से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होगा। जब करोड़ों भारतीयों ने साथ मिलकर ताली और थाली बजाई तो वह दृश्य देखने लायक था। वातावरण भयमुक्त हो चुका था और एक संकल्प का भाव सभी के चेहरों पर था कि कोरोना को हम हराकर रहेंगे।
भोजन वितरण
समाजसेवा का जो उदाहरण भारत में लॉकडाउन के दिनों में देखने को मिला, उसे देखकर अलग ही सुकून मिला कि अभी भी इंसानियत जिंदा है। लोगों ने रंग भेद, धर्म ,राजनीति सभी को अलग रखकर उन सभी की सहायता की जिन्हें सहायता की आवश्यकता थी। लोगों के पास रोजगार न होने पर भी उन्हें खाली पेट नहीं सोना पड़ा। हर एक शख्स से जैसा और जितना बना, उसने उतना किया।
नुस्खों का आदान-प्रदान
इस दौरान दादी- नानी के नुस्खे भी बहुत इधर- उधर हुए। जिस इंसान को हम जानते नहीं लेकिन यदि हमें पता चला कि उसे कुछ बीमारी है और अस्पताल जाना अभी संभव नहीं है। ऐसे में हमें जो भी प्रभावी नुस्खा पता था या जिससे हम पहले स्वस्थ हो चुके हैं, वो हमने उनसे साझा किया। ऐसा करके हमने मानवता को तो जिंदा रखा है, साथ ही समाज को एकता का संदेश भी दिया।