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आखिर क्यों ऑफिस से पेन और पेपर चुराते हैं लोग? रिसर्च में खुलासा

Mon, 14 Jan 2019 04:58 PM IST
मंजू ममगाईं बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Published by: मंजू ममगाईं Updated Mon, 14 Jan 2019 04:58 PM IST
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This is why people steals office supplies like pen and paper from work place

आपने कभी दफ्तर से मिलने वाला पेन चुराया है? दफ्तर की कैंटीन में खाते हुए आप वहां का चम्मच घर ले आए हैं? अपने निजी दस्तावेजों के प्रिंटआउट ऑफिस के प्रिंटर से निकाले हैं? ऑफिस से बच्चों की ड्राइंग के प्रिंट निकाले हैं? उनके लिए कागज लेकर गए हैं? कई नौकरीपेशा लोगों का इन सवालों का जवाब 'हां' में होगा। नौकरी करने वाले अक्सर ऐसी छोटी-मोटी 'चोरियां' करते हैं। हाल ही में ब्रिटेन में पेपरमेट नाम की कंपनी ने जब नया पेन लॉन्च किया तो एक सर्वे किया। इस सर्वे में शामिल सभी लोगों ने कहा कि उन्होंने ऑफिस का पेन चुराया है! ऐसे ही दूसरे रिसर्च बताते हैं कि करीब 75 प्रतिशत नौकरीपेशा लोगों ने दफ्तर से ऐसा छोटा-मोटा सामान चुराया।

This is why people steals office supplies like pen and paper from work place

अरबों का नुकसान

इन मामूली चोरियों से नुकसान बहुत बड़ा होता है। मोटे अंदाजे के मुताबिक ऐसी छोटी-मोटी चोरियों से अरबों डॉलर का सालाना नुकसान होता है। इन चोरियों से कंपनियों के दफ्तर का सामान 35 फीसद तक कम हो जाता है। ये कई कंपनियों के सालाना कारोबार का 1.4 फीसद तक होता है। तो, अगर हमारा ऐसा बर्ताव अर्थव्यवस्था और कंपनी के लिए इतना घाटे का सौदा है, फिर भी हम ऐसी चोरियां क्यों करते हैं?

इस सवाल का जवाब मनोविज्ञान में छिपा है। हम जब नौकरी की शुरुआत करते हैं, तो कंपनी या आप को रोजगार देने वाले लोग आपसे कुछ वादे करते हैं। अक्सर ये ऐसी बातें होती हैं, जो नौकरी के कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा नहीं होती हैं।

जैसे काम के घंटे तय नहीं होंगे, काम का माहौल अच्छा होगा, दोस्ताना रहेगा, आप सुविधा के हिसाब से काम पर आ सकते हैं। ऐसे अनकहे वादे आप के अंदर उम्मीद जगाते हैं। जानकार इन्हें मनोवैज्ञानिक कॉन्ट्रैक्ट कहते हैं।

जब तक कंपनी अपने इन अनकहे वादों को पूरा करती रहती है तब तक नौकरी करने वाले के लिए भी सब कुछ ठीक रहता है। नौकरी करने वाले भी कंपनी के प्रति वफादार बने रहते हैं। पर, मुश्किल ये है कि शायद ही ऐसा होता हो। वक्त बीतते ही कंपनी और कर्मचारी एक-दूसरे से बेजार होने लगते हैं।

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वादे टूटते हैं

ज़्यादातर कर्मचारी ये मानते हैं कि कंपनी ने उनसे किया हुआ अलिखित करार तोड़ा है। काम के जिस माहौल को देने का वादा था, वैसा माहौल नहीं है।काम के घंटों का दबाव है, छुट्टियां नहीं मिलतीं, करीब 55 फीसद नौकरीपेशा लोगों को शिकायत है कि कंपनियों ने उनसे किए वादे पूरे नहीं किए और ऐसा नौकरी के पहले दो सालों के भीतर होता है। वहीं 65 फीसद तो ये कहते हैं कि नौकरी के पहले ही साल में उनकी उम्मीदें टूट गई थीं।

कुछ हालिया सर्वे कहते हैं कि कई नौकरीपेशा लोग तो रोजाना या हफ़्तावार वादे टूटने की शिकायतें करते हैं।अब जब कंपनी ऐसा करती है, तो कर्मचारी ने भी जो अनकहा वादा किया होता है, वो तोड़ने लगते हैं। अच्छे बर्ताव, छुट्टी जरूरी होने पर ही लेना और दफ़्तर के सामान का उचित रख-रखाव करने जैसे अनकहे वादे कर्मचारी भी तोड़ने लगते हैं।

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कर्मचारियों की तसल्ली

मजे की बात ये है कि न कंपनी को इस बात का एहसास होता है कि उसने कोई वादा तोड़ा, न ही कर्मचारी ये महसूस करता है। नतीजा ये कि कंपनी को भी लगता है कि जो बर्ताव वो कर्मचारी से कर रही है, वो ठीक है। वहीं कर्मचारी भी बदले में ऐसी छोटी-मोटी चोरियां करके अपनी तसल्ली करने लगते हैं। अक्सर होता ये है कि कंपनियां अपने वादे से मुकर जाती हैं। उन्हें महसूस भी नहीं होता कि कर्मचारी से उन्होंने ये छल किया है। अब जब महसूस नहीं होता, तो फिर उसका हल निकालने का सवाल भी नहीं पैदा होता।

आपने गलत किया, तो क्या हम बदला भी न लें? नौकरी करने वाले लोग ये सोचते हैं कि जब कंपनी ने उनकी उम्मीदें तोड़ी, तो वो भी इस बात का हक रखते हैं कि अच्छे कर्मचारी की जिम्मेदारी निभाने से बचें।

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बदले की भावना का पनपना

कंपनी से नाखुश कर्मचारी अक्सर नेगेटिव ख्यालात के शिकार हो जाते हैं। वो गुस्सा करते हैं, खीझते हैं, भड़क उठते हैं। फिर वो बदले की भावना से भर जाते हैं। रिसर्च कहते हैं कि ऐसी भावना उन कर्मचारियों में ज़्यादा आती है, जो अच्छा काम करते हैं। अगर वो ये महसूस करते हैं कि कंपनी ने उनके साथ इंसाफ नहीं किया। तरक़्की नहीं दी। छुट्टी नहीं दी। तो फिर वो बदले के मूड में आ जाते हैं। क्योंकि कंपनी से बदला लेकर उन्हें अच्छा महसूस होता है।

बदला लेने की खुशी ज़्यादा देर नहीं रहती

आम तौर पर लोग कंपनी को नुकसान पहुंचाकर फौरी खुशी तो हासिल कर लेते हैं। मगर ऐसी चोरियां करने के बाद उन्हें पछतावा भी होता है। सवाल ये उठता है कि फिर कर्मचारी को क्या करना चाहिए? मनोवैज्ञानिक इसके लिए BRAIN इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं। BRAIN यानी Benefits, Risks, Alternatives, Information and Nothing। जब भी आप को ये महसूस होता है कि कंपनी ने आप से छल किया है, तो आप पहले शांत दिमाग से ये सोचें कि बदला लेंगे, तो आप को इसका क्या फायदा होगा.दफ़्तर में चोरी के जोखिम का अंदाज़ा भी लगा लीजिए। हो सकता है कि ऑफिस में चोरी से आप कुछ देर के लिए बेहतर महसूस करें। मगर ये खुशी लंबे वक़्त तक नहीं टिकती। अब जब जोखिम भी है और खुशी स्थायी भी नहीं, तो फिर आप को ऑफिस में चोरी के विकल्पों पर गौर करना चाहिए। अक्सर कंपनियों को पता ही नहीं होता कि कर्मचारी ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। उन्हें एहसास ही नहीं होता कि अच्छे माहौल का वादा उन्होंने तोड़ दिया है, तरक़्की का कौल नहीं निभाया है।

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