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अगर लड़कियां लड़कों का पीछा करें तो...
Sun, 13 Jan 2019 11:11 AM IST
मोना नारंग
बीबीसी
बीबीसी
Published by: मोना नारंग
Updated Sun, 13 Jan 2019 11:11 AM IST
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molest
बैंगलुरू में एक आदमी एक टीचर की तरफ आकर्षित होता है पर वो मना करती है तो वो उसकी हत्या कर देता है। दिल्ली में एक लड़की अपना पीछा करनेवाले लड़के के खिलाफ पुलिस में शिकायत करती है, इसके बावजूद वो चाकू से गोदकर उसकी जान ले लेता है। कड़े कानूनों के बावजूद ऐसी वारदातें अक्सर होती हैं। लड़की के 'मना' करने के बाद भी कई लड़के जबरदस्ती उनका पीछा करते हैं और अपनी बात मनवाने के लिए हिंसा पर उतर आते हैं।
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फिल्मों में उसे जबरदस्ती 'हां' में बदलना 'प्यार' होता है और असल जिंदगी में हिंसा का रूप ले लेता है।
क्रिमिनल साइकॉलोजिस्ट डॉ. अनुजा कपूर के मुताबिक ऐसे मामले में लड़की का व्यवहार बहुत अलग होता है। वो कहती हैं, "लड़की के एक-तरफा प्यार को लड़का ठुकराए तो वो उसको नुकसान पहुंचाने के बजाय खुद को तकलीफ देती है, नस काट सकती है, आत्महत्या की कोशिश तक कर सकती है।"
पर ये इतना उल्टा क्यों? कई बार ऐसी वारदातें होती हैं जहां लड़की की 'ना' सुनकर भड़का लड़का उस पर एसिड फेंककर 'सबक' सिखाने की कोशिश करता है। वो सोचता है कि वो लड़की अगर उसकी ज़िंदगी का हिस्सा बनने को तैयार नहीं तो किसी और की भी ना बन सके। एसिड से उसका खूबसूरत चेहरा तो जलता ही है, इलाज का खर्च, दिन-दहाड़े हमले का डर, हिम्मत को चोट जैसे गहरे घाव हो जाते हैं। अपना मनपसंद प्यार ना मिलने पर लड़कियां ऐसी हिंसा पर क्यों नहीं उतरतीं? ऐसे घाव देने से उन्हें चैन क्यों नहीं मिलता?
मैं लड़कियों और लड़कों को दो अलग खांचों में नहीं रखना चाहती। ना उनके स्वभाव का विश्लेषण करना चाहती हूं। पर ये समझती हूं कि समाज में जब नवजात को पाल-पोस कर लड़का या लड़की बनाया जाता है तो कहे-अनकहे कुछ हक़ दे दिए जाते हैं और कुछ खींच लिए जाते हैं। मसलन प्यार अक्सर लड़के पहले जताते हैं। लड़की को वो चुनते हैं। छेड़कर, आकर्षण जताना लड़कों के लिए आम माना जाता है। फिर फिल्मों में भी ऐसी सोच को साधारण माना जाता है कि लड़की के शर्मीले या गुस्सैल स्वभाव की वजह से उसकी 'ना' में 'हां' छिपी होती है। फिल्मों में उसे जबरदस्ती 'हां' में बदलना 'प्यार' होता है और असल जिंदगी में हिंसा का रूप ले लेता है।
पर ये इतना उल्टा क्यों? कई बार ऐसी वारदातें होती हैं जहां लड़की की 'ना' सुनकर भड़का लड़का उस पर एसिड फेंककर 'सबक' सिखाने की कोशिश करता है। वो सोचता है कि वो लड़की अगर उसकी ज़िंदगी का हिस्सा बनने को तैयार नहीं तो किसी और की भी ना बन सके। एसिड से उसका खूबसूरत चेहरा तो जलता ही है, इलाज का खर्च, दिन-दहाड़े हमले का डर, हिम्मत को चोट जैसे गहरे घाव हो जाते हैं। अपना मनपसंद प्यार ना मिलने पर लड़कियां ऐसी हिंसा पर क्यों नहीं उतरतीं? ऐसे घाव देने से उन्हें चैन क्यों नहीं मिलता?
मैं लड़कियों और लड़कों को दो अलग खांचों में नहीं रखना चाहती। ना उनके स्वभाव का विश्लेषण करना चाहती हूं। पर ये समझती हूं कि समाज में जब नवजात को पाल-पोस कर लड़का या लड़की बनाया जाता है तो कहे-अनकहे कुछ हक़ दे दिए जाते हैं और कुछ खींच लिए जाते हैं। मसलन प्यार अक्सर लड़के पहले जताते हैं। लड़की को वो चुनते हैं। छेड़कर, आकर्षण जताना लड़कों के लिए आम माना जाता है। फिर फिल्मों में भी ऐसी सोच को साधारण माना जाता है कि लड़की के शर्मीले या गुस्सैल स्वभाव की वजह से उसकी 'ना' में 'हां' छिपी होती है। फिल्मों में उसे जबरदस्ती 'हां' में बदलना 'प्यार' होता है और असल जिंदगी में हिंसा का रूप ले लेता है।
मैंने जब आत्मरक्षा यानी सेलिफ-डिफेंस की एक वर्कशॉप में हिस्सा लिया
ऐसा तो कहीं नहीं दिखाया जाता कि लड़का किसी लड़की को 'ना' कहे तो लड़की उसमें 'हां' समझ ले और फिर अपनी बात मनवाने के लिए किसी भी हिंसक हद तक चली जाए। फिर बचपन से ही समाज उन्हें देवी के रूप से और जल्दी माफ करनेवाली के तौर पर देखता है। यहां तक कि कानून में भी ऐसे अपराध के लिए लड़कों को ही दोषी माना गया है। डॉ कपूर के मुताबिक समाज लड़कियों को बार-बार ये अहसास दिलाता है कि वो शारीरिक तौर पर लड़कों से कमजोर हैं जिस वजह से उनमें घात लगाकर हमला करने वाली, यानी 'प्रिडेट्री' प्रवृति पनपने ही नहीं दी जाती। इसका असर सिर्फ हिंसा करने पर नहीं, खुद को हमलों से बचाने के मामले में भी देखने को मिलता है।
मैंने जब आत्मरक्षा यानी सेलिफ-डिफेंस की एक वर्कशॉप में हिस्सा लिया तो हमें बताया गया कि हमला होने पर इंसान का शरीर ऐसे हार्मोन बनाने लगता है जो अधिक ऊर्जा देते हैं। पर लड़कियों में हमला करने की प्रवृति विकसित नहीं हुई होती इसलिए वो इस ऊर्जा का इस्तेमाल सामना करने के बजाय डर में तब्दील हो जाता है। इसलिए आत्मरक्षा की ओर पहला कदम था जरूरत के समय लड़कियों का आक्रामक होने को सही समझना। ऐसा नहीं कि मैं लड़कियों के हिंसक होने की वकालत कर रही हूं बल्कि आइना दिखाकर ये जताना चाहती हूं कि पीछा कर हिंसक होने की छूट कहीं हम सबने मिलकर ही तो लड़कों को नहीं दी? और उसे बदलना काफी हद तक हमारे हाथ में ही है
मैंने जब आत्मरक्षा यानी सेलिफ-डिफेंस की एक वर्कशॉप में हिस्सा लिया तो हमें बताया गया कि हमला होने पर इंसान का शरीर ऐसे हार्मोन बनाने लगता है जो अधिक ऊर्जा देते हैं। पर लड़कियों में हमला करने की प्रवृति विकसित नहीं हुई होती इसलिए वो इस ऊर्जा का इस्तेमाल सामना करने के बजाय डर में तब्दील हो जाता है। इसलिए आत्मरक्षा की ओर पहला कदम था जरूरत के समय लड़कियों का आक्रामक होने को सही समझना। ऐसा नहीं कि मैं लड़कियों के हिंसक होने की वकालत कर रही हूं बल्कि आइना दिखाकर ये जताना चाहती हूं कि पीछा कर हिंसक होने की छूट कहीं हम सबने मिलकर ही तो लड़कों को नहीं दी? और उसे बदलना काफी हद तक हमारे हाथ में ही है