11 अगस्त 2020 को टीवी स्क्रीन पर आकर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ये दावा करते हैं कि उनके वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस के खिलाफ कारगर वैक्सीन तैयार कर ली है। रूस ने इस वैक्सीन को नाम दिया स्पुतनिक-वी। रूसी भाषा में 'स्पुतनिक' का अर्थ होता है सैटेलाइट। सोवियत यूनियन ने साल 1957 में विश्व का पहला सैटेलाइट बनाया था। उसका नाम भी स्पुतनिक ही रखा गया था।
कोरोना की सुरक्षित और कारगर वैक्सीन के लिए और कितना इंतजार करना होगा?
वैक्सीन जल्द बनाने का दबाव
कोरोना वायरस की पहली वैक्सीन कब तक बन सकती है, इस सवाल पर कोलंबिया यूनिवर्सिटी में वॉयरोलोजिस्ट एंजेला रैसमसन कहती हैं, "मुझे लगता है कि बहुत जल्दी होगा तब भी, साल 2020 के आख़िरी तक या साल 2021 के पहले कुछ महीनों तक ही कोरोना की वैक्सीन बन पाएगी, उससे पहले नहीं।"
कोरोना महामारी पर काबू पाने के लिए दुनियाभर के रिसर्च इंस्टीट्यूट और फॉर्मास्यूटिकल कंपनियां सौ से ज्यादा वैक्सीन पर काम कर रही हैं। चीन की तीन, अमरीका की दो और ब्रिटेन की एक वैक्सीन, विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक परीक्षण के अंतिम चरण में पहुंच चुकी हैं।
एंजेला रैसमसन के मुताबिक, ''इनमें तीन अलग टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल हो रहा है। सब इस तरह काम करते हैं कि पहले इम्यून सिस्टम में कोरोना वायरस का पता लगाते हैं और फिर उस हिसाब से एंटीबॉडीज तैयार करते हैं।'' ब्रिटेन में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और ग्लोबल ड्रग्स फर्म-एस्टरजेनेका साथ मिलकर जो वैक्सीन बना रहे हैं, उसमें कोरोना वायरस से मिलते-जुलते वायरस का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो आमतौर पर सिर्फ चिम्पैंजी पर असर करता है।
वहीं अमेरिका में दवा कंपनी मोडर्ना जिस mRNA वैक्सीन पर काम कर रही है, उसमें जेनेटिक मटैरियल की मदद से स्पाइक प्रोटीन तैयार किया जाता है। और तीसरी विधि वो है जिस पर चीन में सायनोवेक बायोटैक (Sinovac Biotech) दवा कंपनी काम कर रही है जिसमें इलाज के लिए वायरस का ही इस्तेमाल किया जाता है।
इन सभी वैक्सीन का सेफ्टी और इम्यून रिस्पांस जानने के लिए अपेक्षाकृत कम लोगों पर परीक्षण हो चुका है। उसके बाद फेज 3 ट्रायल की बारी है। एंजेला रैसमसन के मुताबिक, ''फेज 3 ट्रायल के लिए कई लोगों को वैक्सीन दी जाती है, हजारों लोगों पर उसे आजमाकर देखा जाता है। फिर देखा जाता है कि जब ये लोग सामान्य जिंदगी में वायरस के संपर्क में आते हैं तो कितने महफूज रहते हैं। बाकी लोगों से उनकी तुलना की जाती है और यदि वो बीमार नहीं पड़ते तो माना जाता है कि वैक्सीन सही तरीके से अपना काम कर रही है।''
वैक्सीन का ट्रायल जब पशुओं पर किया जाता है तो बात अलग होती है। लेकिन जब वही ट्रायल इंसानों पर किया जाता है, तो इस बात का खासतौर पर ख्याल रखा जाता है कि उनकी हेल्थ से किसी तरह का खिलवाड़ ना हो। एंजेला रैसमसन के अनुसार, ''इसके लिए ट्रायल पार्टिसिपेंट्स का रिक्रूटमेंट किया जाता है, जो उन इलाकों में रहते हैं जहां वायरस का ख़तरा ज्यादा है। यही वजह है कि जिन देशों में कोरोना के मामले कम हैं, वो अपनी वैक्सीन के फेज 3 के ट्रायल ब्राजील जैसे देशों में कर रहे हैं जहां संक्रमण के मामले बहुत अधिक हैं।''
वैज्ञानिकों पर वैक्सीन जल्द से जल्द बनाने का दबाव है और इसके साथ अन्य ख़तरें भी जुड़े हुए हैं। एंजेला रैसमसन का मानना है, ''अगर आपके पास समय नहीं है और आप बहुत जल्दी में काम कर रहे हैं तो डेटा को ठीक से समझ नहीं पाएंगे। ट्रायल पार्टिसिपेंट्स के लिए आप उन लोगों को रिक्रूट नहीं कर पाएंगे जो वाकई रिस्क जोन में रहते हैं।'' इसका नतीजा ये होता है कि वैक्सीन के ट्रायल के सटीक नतीजे नहीं मिलते और सटीक नतीजे नहीं मिलने पर कोई वैक्सीन कामयाब नहीं हो सकती।
वैक्सीन की मांग कैसे पूरी होगी?
प्रयोगशाला में वैक्सीन विकसित करना एक बात है और लाखों-करोड़ों लोगों के लिए बड़े पैमाने पर वैक्सीन का निर्माण करना दूसरी बात। वैक्सीन का निर्माण इतने बड़े पैमाने पर आखिर कैसे होगा? इस सवाल पर अमेरिका में येल इंस्टीट्यूट ऑफ ग्लोबल हेल्थ के डायरेक्टर साद उमर कहते हैं, "हमने इससे पहले, इतने बड़े पैमाने पर कभी कोई वैक्सीन नहीं बनाई। वैक्सीन का लाइसेंस मिलने के बाद उसका उत्पादन बढ़ाया जाता है। कोरोना वायरस ने जिस हिसाब से हाहाकार मचाया है, उतने ही बड़े पैमाने पर वैक्सीन के लिए निवेश किया जा रहा है। फिर भले ही उस निवेश का एक हिस्सा बेकार चला जाए।"