दुनिया के तमाम हिस्सों में कोरोना संक्रमण के मामलों में एक बार फिर से उछाल देखने को मिल रहा है। कई देशों ने बढ़ते केस को देखते हुए दोबारा से आवश्यक प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए हैं। भारत के संदर्भ में बात करें तो यहां पिछले कुछ दिनों से कोरोना के मामलों और मृत्यु के आंकड़ों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक कोरोना के गंभीर संक्रमण और इसके कारण होने वाली मौत के खतरे से बचने के लिए सभी लोगों को वैक्सीनेशन करा लेना चाहिए। भारत में अब तक 111 करोड़ से अधिक लोगों को वैक्सीन की कम से कम एक डोज मिल चुकी है।
सर्वे: टीकाकरण स्वैच्छिक होने के बावजूद लोगों पर बनाया जा रहा है दबाव, जानिए क्या है सरकार का पक्ष?
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कई स्थानों पर कर दिया गया है वैक्सीनेशन अनिवार्य
देश के 328 जिलों में करीब 36 हजार लोगों पर किए गए इस सर्वे में टीकाकरण की अनिवार्यता की बात सामने आई है। सर्वे में शामिल 26 फीसदी लोगों ने बताया कि स्थानीय प्रशासन ने उनके जिले में सभी निवासियों के लिए वैक्सीन लेना अनिवार्य कर दिया है। कई ऑफिसों ने कर्मचारियों को वैक्सीन की दूसरी डोज के सार्टिफिकेट के साथ ही प्रवेश की अनुमति दी है। इतना ही नहीं राशन और मिलने वाली अन्य सरकारी सुविधाओं के लिए भी वैक्सीन सार्टिफिकेट की मांग की जा रही है।
सर्वे में क्या पता चला?
सर्वेक्षण में 29 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उनके क्षेत्र जैसे कॉलोनी/ बाजार संघों ने लोगों के लिए वैक्सीन का प्रमाण दिखाना अनिवार्य कर दिया है। 40 फीसदी लोगों का कहना है कि उनके
नियोक्ताओं या दफ्तर ने टीकाकरण अनिवार्य कर दिया है, यहां तक कि बिना प्रमाणपत्र के प्रवेश भी नहीx दिया जाता। गांव-शहर सभी स्थानों से ही कमोबेश ऐसी ही प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। उदाहरण के लिए औरंगाबाद जिला कलेक्टरेट ने उचित मूल्य की दुकानों, गैस एजेंसियों और पेट्रोल पंपों पर केवल उन लोगों को सुविधाएं देने का नियम बनाया है जिन्होंने वैक्सीन की कम से कम एक खुराक ले ली है।
सरकार का क्या कहना है?
8 अक्टूबर को बॉम्बे उच्च न्यायालय में दायर एक जवाबी हलफनामे के माध्यम से केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा था कि कोविड के लिए टीकाकरण सामाजिक दायित्व का मामला है और इसे सार्वजनिक हित के तौर पर देखना चाहिए। कोरोना संक्रमण की इस लड़ाई में सभी लोगों को एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में टीकाकरण कराना चाहिए। हालांकि इसका किसी भी तरह से यह मतलब नहीं है कि किसी भी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध टीका लगाने के लिए मजबूर किया जा सकता है।
वैक्सीनेशन को लेकर दबाव बनाना सही नहीं
वैक्सीनेशन को लेकर केंद्र सरकार के आदेश में इसकी अनिवार्यता जैसा कोई भी जिक्र नहीं है, यानी कि यह व्यक्ति के विवेक पर निर्भर करता है। वहीं कानूनी नजरिए से देखें तो भी संविधान के आर्टिकल 21 में लोगों को 'राइट टू हेल्थकेयर' का विकल्प दिया गया है, जिसके आधार पर वे अपने लिए स्वेच्छा से बेहतर स्वास्थ्य विकल्पों का चयन कर सकते हैं। तो ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कंपनियां, कर्मचारियों से वैक्सीनेशन कराने पर दबाव क्यों डाल रही हैं? कोरोना से बचाव के लिए टीकाकरण आवश्यक है, पर इसका लोगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दबाव बनाना कितना सही है।
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