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देखिए, कैसे कश्मीर की विरासत बदल गई कचरे के ढेर में
Wed, 22 Oct 2014 05:18 PM IST
Updated Wed, 22 Oct 2014 05:18 PM IST
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यह शाही राजघराने की कब्रगाह के तौर पर मक़बूल था। 15वीं सदी के सुल्तान गियासुद्दीन ज़ैनुलाब्दीन की कब्र भी यहीं थी। शाहमीरी शैली में बना ये मक़बरा भारत में अपनी तरह का अनोखा है। लेकिन ये झेलम के किनारे था। सैलाब के पानी ने मक़बरे को तो बख्श दिया लेकिन कई कब्रें वह अपने साथ बहाकर ले गई।
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झेलम के किनारे ईसाइयों की भी कब्र थी जिसे औपनिवेशिक काल की विरासत के तौर पर देखा जाता है। यहां ज्यादातर श्रीनगर में रह रहे ब्रितानी सैन्य अधिकारियों और इसाई मिशनरियों से जुड़े लोगों की कब्रें थीं। इनमें से ज्यादातर को बाढ़ अपने साथ ले गई।
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ये वो नुकसान है जिसकी भरपाई अब नहीं की जा सकती है। कश्मीर की विरासत में वहां की अपनी वास्तुकला के साथ साथ ब्रितानी असर भी है। यहां ज्यादातर इमारतें ढह गई हैं या फिर काफी हद तक बर्बाद हो गई हैं। 'खोसला' और 'रत्तन' जैसी कोठियां शहर की दौलत की नुमाइश करती हुई लगा करती थीं।
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झेलम के किनारे बनी इस इमारत को 'गुज़र' कहते हैं। यह नदी के मुहाने का प्रतीक था। 19वीं सदी की ये मशहूर इमारत बाढ़ के साथ बर्बाद हो गई। डोगरा शासन के दौरान होने वाले कारोबार और उससे जुड़े सख्त नियम कायदों की याद दिलाने वाली ये आखिरी इमारत रह गई थी।
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कश्मीर के म्यूज़ियम का खजाना भी अब पहले जैसा नहीं रहा। कश्मीरी शॉल, हाथ से बने कागज़ की चीजें और बौद्ध युग, धर्म और खगोल विज्ञान से जुड़ी गिलगित की दुर्लभ पांडुलिपियां और यहां तक कि सातवीं सदी की चीजें भी श्री प्रताप सिंह म्यूज़ियम में देखी जा सकती थीं। यहां रखीं दस फीसदी चीजें नष्ट हुई हैं और नेशनल म्यूज़ियम इनके संरक्षण के लिए मदद कर रहा है।
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