गोरखपुर जिले के पिपराइच का प्रदीप मलबे में दबा था। ऊपर से मलबे के ढेर के बीच से उसे सब देख ले रहे थे। अंदर से वह भी पानी मांग रहा था। उसकी हर कराह पर बाहर खड़े अफसर भी यही पूछते, कितना समय लग जाएगा बाहर निकालने में। दस-दस मिनट करते-करते राहत बचाव कार्य में करीब ढाई घंटे लग गए।
तस्वीरों में देखें कैसे किया रेस्क्यू: छज्जा गिरने से एक की मौत, अंदर मजदूर और बाहर तड़पते रहे अधिकारी
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प्रदीप के जिंदा बाहर आते ही अफसरों ने भी बाहर राहत की सांस ली। सबकी जुबान पर एक ही सवाल, जिंदा है ना। डॉक्टरों की टीम ने पुष्टि की पल्स ठीक है, कोई दिक्कत नहीं। सबने राहत की सांस ली। आननफानन उसे मेडिकल कॉलेज भेजा गया। पूरे घटनाक्रम के दौरान कमिश्नर रवि कुमार एनजी, डीआईजी जे. रविंद्र गौड़ थोड़ी दूरी से देखते रहे तो एसएसपी डॉ. गौरव ग्रोवर रेस्क्यू को हेड कर रहे थे।
एसपी सिटी कृष्ण कुमार बिश्नोई कभी इधर तो कभी उधर सारी व्यवस्था को देखते रहे। स्वास्थ्य विभाग, नगर निगम की टीम भी मौके पर जमी रही। प्रदीप के निकलने के साथ ही राजू को भी रेस्क्यू किए जाने की कोशिश जारी रही। रात करीब 10 बजे के करीब राजू को बाहर तो निकाल लिया गया, लेकिन उसकी मौत हो चुकी थी।
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बोल रहा है ना, दूसरा वाला हो सकता है बेहोश हो
डीआईजी जे. रविंद्र ने एसपी सिटी व अन्य से बार-बार यही पूछा कि फंसा युवक बोल तो रहा है ना। दूसरे की कोई आवाज। जब यह पता चला कि दूसरे की कोई आवाज नहीं आ रही तो वह कमिश्नर से बोले- हो सकता है कि वह बेहोश हो। काश ऐसा ही हो, अगर ऐसा होगा तो वह बच सकता है। इसी बीच आए एसएसपी डॉ. गौरव जो डॉक्टर भी हैं, उनसे चिकित्सा की तकनीकी के बारे में भी पूछा। इससे एक बात तय हो गई कि एक तो बच जाएगा।
सिस्टम की खामियां भी उजागर, रेस्क्यू में आ रही थी दिक्कत
पूरे घटनाक्रम के दौरान अफसरों की संजीदगी तो दिखी, लेकिन सिस्टम की खामियां भी उजागर हो गईं। बीच शहर के एक कॉलेज में इस तरह से निर्माण हो रहा था और जीडीए को भनक तक नहीं लगी। निर्माण की स्थिति को देखकर एक आम आदमी भी बता दे रहा था कि यह पूरी तरह से गलत हो रहा है। फिर जीडीए के जिम्मेदारों और फिर कॉलेज प्रशासन की नजर उसपर कैसे नहीं पड़ी? यह सवाल सभी की जुबान पर है।
निर्माण का हाल साफ दिख रहा था। बीस फीट की ऊंचाई पर करीब 40 फीट चौड़ी छत की ढलाई की तैयारी थी। एक भी पिलर नीचे से रोकने को नहीं दिया गया था। वहीं, हादसे के बाद भीड़ जुट गई। रेस्क्यू करने वाली जगह और एंबुलेंस के बीच में लोग आ जा रहे थे। वहां पर कोई ऐसा घेरा नहीं बनाया गया था, जिससे लोगों को रोका जा सके। बाद में जब एसएसपी और एसपी सिटी की नजर पड़ी तो उन्होंने सख्ती की और फिर लोगों को कुछ दूर किया गया। इतने बड़े हादसे के बाद प्रशासन, पुलिस, नगर निगम, स्वास्थ्य, अग्निशमन विभाग, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ की मदद में मौजूद थे, लेकिन जिस जीडीए की सबसे पहली जिम्मेदारी थी, उसका एक भी अफसर वहां पर मौजूद नहीं था। जो यह बता सके कि काम कौन करा था, कैसे हो रहा था। बाद में कमिश्नर रवि कुमार एनजी ने जीडीए को निर्देशित किया तो जागे अफसर वहां पर पहुंचे और फिर जांच शुरू की गई।
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