गीता प्रेस के प्रबंधक लालमणि बताते हैं कि स्वअध्याय के दौरान जयदयालजी को प्रेरणा मिली की गीता सभी के लिए सर्वसुलभ होनी चाहिए। सेठजी ने गोविंद भवन सोसाइटी की तरफ से कोलकाता के ही वणिक प्रेस से गीता की प्रतियां छपवाईं। लेकिन, मुद्रण में कईं त्रुटियां थी। उन्होंने इसे कई बार दुरुस्त करने के लिए कहा तो प्रेस संचालक ने बार-बार संशोधन को मुमकिन नहीं बताते हुए कहा कि- आप इतनी शुद्ध पुस्तक चाहते हैं तो अपनी निजी प्रेस लगवाकर छपवाएं...। इस घटना के बाद ही गीता प्रेस की गोरखपुर में स्थापना की नींव पड़ी। आइए इसे लाइव पढ़ते हैं...
Gita Press: धर्म, संस्कृति और परंपरा को समेटे गीताप्रेस ने देखे 100 बसंत, जानिए किस बात पर हुई थी इसकी शुरुआत
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दाहिनी तरफ एक छोटे से कमरे में फाइलों में खोये गीता प्रेस के प्रबंधक डॉ लाल मणि त्रिपाठी ने इशारा कर बैठने को आमंत्रित किया। एक मिनट बाद लंबी सांस खींचकर मुस्कुराते हुए बोले- हिसाब-किताब है। उत्साह से बताया कि गीता प्रेस अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है। हिंदू पंचांग के मुताबिक 14 मई 2022 को शताब्दी वर्ष का शुभारंभ हुआ था। इस मौके पर चार जून 2022 को पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आए थे। बुधवार यानी 3 मई को समापन समारोह है। बहुत भव्य तैयारी की गई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुख्य अतिथि थे, मगर निकाय चुनाव की वजह से आखिरी मौके पर उनका कार्यक्रम निरस्त हो गया । तय हुआ है कि समापन समारोह पर सादगी से भजन कीर्तन का एक घंटे का कार्यक्रम होगा। जब प्रधानमंत्री का कार्यक्रम फिर से मिलेगा तो वृहद तौर पर इस खास मौके का जश्न मनाया जाएगा।
ईश्वरीय प्रेरणा से शुरू हुई 'गीता'
100 साल के सफर को साझा करते हुए डॉ लाल मणि त्रिपाठी कहते हैं कि गीता प्रेस की स्थापना ईश्वरीय प्रेरणा से हुई। यही वजह रही कि धर्म, संस्कृति और परंपरा को समेटे हुए गीता प्रेस ने 100 बंसत देखे, पतझड़ कभी नहीं देखा। गीता प्रेस की स्थापना करने वाले चूरू राजस्थान के रहने वाले जयदयालजी गोयंदका (सेठजी) गीता-पाठ, प्रवचन में बहुत रुचि लेते थे। व्यापार के सिलसिले में उनका कोलकाता आना-जाना होता रहता था। वहां वह दुकान कि गद्दियों में भी सत्संग किया करते थे। धीरे-धीरे सत्संगियों की संख्या इतनी बढ़ गई कि जगह की समस्या खड़ी होने लगी। इसपर उन्होंने कोलकाता में बिड़ला परिवार के एक गोदाम को किराए पर लिया और उसका नाम रखा गोविंद भवन। वे बताते हैं कि कोलकाता में वणिक प्रेस के संचालक की टिप्पणी को जयदयाल जी गोयंदका ने ईश्वर का संदेश माना। मदद की गोरखपुर के साहबगंज निवासी सेठ घनश्यामदास और महावीर प्रसाद पोद्दार ने। 10 रुपये महीने के किराए पर हिन्दी बाजार में 29 अप्रैल 1923 में प्रेस की स्थापना हुई। जरूरत के साथ 1926 में वर्तमान गीताप्रेस की जमीन खरीदी गई जो दो लाख वर्ग फिट में है।
लीला चित्र मंदिर के दीवार पर लिखी है संपूर्ण गीता
गीता प्रेस का लीला चित्र मंदिर अपने आप में अनोखा है। ऐसा चित्र मंदिर पूरी दुनिया में कहीं नहीं है। यहां श्रीमद्भागवत गीता के 18 अध्याय दीवारों पर लिखे गए हैं। साथ ही सैकड़ों की संख्या में देवी-देवताओं के चित्र एक ही छत के नीचे मौजूद हैं जो और कहीं नहीं हैं। इसका उद्घाटन 29 अप्रैल 1955 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया था।
मंदिर में पूर्व की तरफ भगवान श्रीकृष्ण के चित्र हैं। पश्चिम की तरफ श्रीराम के लीला-चित्र हैं। दक्षिण की तरफ दशावतार व इससे जुड़े चित्र हैं, तो उत्तर की ओर नवदुर्गा समेत अनेक देवियों के चित्र हैं। यहां कई चित्र ऐसे हैं जो 200 सालों से भी ज्यादा पुरानी है। इसके साथ ही इस मंदिर में महात्मा गांधी का पत्र, पहली छपाई मशीन, कॉम्पैक्ट डिस्क पर लीखी गई संपूर्ण गीता आकर्षण का केंद्र है।