पूर्वांचल के अलमस्त इलाके सलेमपुर की कई छवियां मशहूर उपन्यासकार विक्रम सेठ की कृति 'ए सुटेबल ब्वाय' में वर्णित सलेमपुर से मिलती है। यह कहानी भी एक सुटेबल ब्वाय की है। जिसने अपने साथियों के मदद से रंगकर्म की गलियों से उठती ‘थिएटर मर रहा है’ की आवाजों को ठिठक जाने पर मजबूर कर दिया।
पूर्वांचल की प्रतिभा को निखार रहा है ये शख्स, ऐसे दे रहा युवाओं के सपनों को पंख
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65 वर्षीय वाई शंकर मूर्ति आंध्र प्रदेश के हैदराबाद के मूल निवासी हैं। वह आंध्र प्रदेश के एक महाविद्यालय से बीकाम करने के बाद रोजगार के लिए मुंबई पहुंचे। 1979 में मुंबई में स्क्रैप फिल्म का कारोबार शुरू किया। चार साल बाद 1983 में उन्हें यूपी के कुछ लोग मिले और काफी नजदीकी बढ़ गई।
यूपी के लोगों से संपर्क कर वे फैजाबाद, हरदोई और आजमगढ़ जैसे जगहों पर टूरिंग टॉकीज चलाते हुए सलेमपुर में पहुंचे और सलेमपुर के सूरज प्रसाद जायसवाल के मकान में टूरिंग टॉकीज खोले। उस समय मकान का किराया ढाई हजार था। सलेमपुर नगर के लोगों की मदद से टॉकीज शानदार चला। यहां के लोगों के सहयोग से मूर्ति ने ठाकुर नगर वार्ड में वर्ष 1988 में खुद का मेनका पिक्चर हाल खोला और इसी को सजाने संवारने जुट गए।
1996 में संस्कार भारती संस्था का इन्हें अध्यक्ष बनाया गया। 2001 में मेनका पिक्चर कैंपस में शेखर सिंह की ओर से प्रस्तुत कबीर का पहला नाटक प्रस्तुत हुआ। जिसे देख प्रेरणा मिली और युवाओं के सहयोग से सलेमपुर की धरती के खुशबू को बटोरने में जुट गए। कैंपस में ग्रामीण अंचलों में छुपी प्रतिभाओं को खोजकर निखारने का कार्य शुरू किया।
वर्ष 2002 में नगर के सलाहाबाद वार्ड में एक और थिएटर बनवाया जो योगी थिएटर के नाम से चलता था। इसी बीच उनकी मुलाकात रंगकर्म की गलियों में बेचैन घूम रहे एक नौजवान मानवेंद्र त्रिपाठी से हुई जो थिएटर के नए चित्र रचने के लिए कैनवास की तलाश में गोरखपुर, कुशीनगर जैसी शहरों से भटकते हुए सलेमपुर पहुंचे थे।
मूर्ति और मानवेंद्र 2005 में सांस्कृतिक संगम संस्था खोला और सलेमपुर के अलावा पूर्वांचल के कलाकारों को मंच देना शुरू किया। सांस्कृतिक संगम का पहली बार योगी थिएटर में ‘मेघदूत पूर्वांचल यात्रा’ का नाटक प्रस्तुत किया था जो तीन दिन तक चला था। नाटक को देखने के लिए 100 से 150 रुपये में टिकट बिका था।
वाई शंकर मूर्ति कहते हैं कि इन दिनों भी मंचन किया जा रहा है। लेकिन कलाकारों को मंचन के हिसाब से मेहनताना नहीं मिल रहा है। सरकार भी ध्यान नहीं दे रही है। ऐसे में नए कलाकार मंच पर कम आ रहे है।
इतना मिला प्यार की भूल गया गांव
वाई शंकर मूर्ति ने बताया कि सलेमपुर पहुंचने के बाद यहां के लोगों का इतना सहयोग और प्यार मिला कि गांव की माटी की खुशबू भूल गई और यहां का निवासी हो गया। मेरा उद्देश्य है कि मंच के माध्यम से युवाओं को आगे बढ़ाया जाए। इन दिनों संस्था में 40 से अधिक कलाकार कार्य कर रहे हैं। जिसमें 18 युवतियां हैं सभी कलाकार पूर्वांचल के ही रहने वाले हैं।
संस्था से जुड़ी गोरखपुर की शुप्रिया गुप्ता को पहली बार 'ससुरा बड़ा पइसा वाला' फिल्म में कार्य करने का मौका मिला था, जो अब कई फिल्मों में काम कर चुकीं हैं। परितोष कुमार, तूलिका उपाध्याय, परितोष त्रिपाठी, राकेश गुप्ता, जहीर, संजय मिश्र भी कई धारावाहिक और फिल्मों में कार्य कर चुके हैं।