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तस्वीरें: जेल से ‘रिहा’ हुए, मगर आज भी ताले में ‘कैद’ हैं बिस्मिल

Sat, 10 Apr 2021 02:56 PM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Sat, 10 Apr 2021 02:56 PM IST
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Special story on Pandit Ramprasad Bismil news update
राम प्रसाद बिस्मिल स्थल। - फोटो : अमर उजाला।

कई साल की जद्दोजहद के बाद गोरखपुर जेल की चहारदीवारी से अलग कर बिस्मिल के स्मारक स्थल को आम लोगों के दर्शन के लिए खोला गया। लेकिन, इसका लाभ उनकी फांसी स्थल का दर्शन करने आने वालों को नहीं मिल रहा है, क्योंकि इस पर ताला लगा रहता है। पर्यटक स्थल के तौर पर इसे विकसित करने के लिए जिस सोच से इस कदम को उठाया गया था, उस पर लापरवाही का ताला लगा हुआ है।



 

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राम प्रसाद बिस्मिल। - फोटो : अमर उजाला।

आलम यह है कि जब भी कोई वहां पर जाकर राम प्रसाद बिस्मिल के अंतिम समय से जुड़ी चीजों को देखना चाहता है तो वहां पर ताला ही बंद मिलता है। ऐसे में अगर जेल में कोई परिचित है तो वह गार्ड को खोज कर दर्शन कर सकता है। नहीं तो उसे बाहर से ही लौटना पड़ता है। वहां पर इसके खुलने और बंद होने का ना तो समय निर्धारित है और न ही दिन में ताला खुला रहता है। इसके पीछे जेलकर्मियों का तर्क चौंकाने वाला है। वे कहते हैं कि कैदी भाग जाएंगे, जबकि स्मारक से लगी जेल की दीवारें इतनी ऊंची हैं और इस तरह से उसे अलग से बनाया गया है कि यह संभव ही नहीं है।

 

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राम प्रसाद बिस्मिल को इसी जगह दी गई थी फांसी। - फोटो : अमर उजाला

11 जनवरी 2020 को आम लोगों के लिए खोले गए थे द्वार
जेल के बाहर से एक रास्ता बनाकर 11 जनवरी 2020 को स्मारक स्थल आम लोगों के लिए खोल दिया गया था। इसके पहले 19 दिसंबर को उनकी शहादत दिवस पर यहां पर कार्यक्रम होते थे, लेकिन जेल से अनुमति लेकर अंदर से ही जाना होता था। जब इसे खोला गया था तो यह भी कहा गया था कि अब पर्यटन के लिहाज से इसे विकसित किया जाएगा और जो चाहे वह आकर दर्शन कर सकता है। उन जगहों को देख सकता है, जहां पर राम प्रसाद बिस्मिल शहादत से पूर्व बंद थे या फिर जहां पर उन्हें फांसी दी गई थी।

 

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राम प्रसाद बिस्मिल अंतिम दिनों में इसी जगह पर बंदी रहे। - फोटो : अमर उजाला

19 दिसंबर को दी गई थी फांसी
काकोरी कांड के महानायक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित राम प्रसाद बिस्मिल को 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल की कोठरी में फांसी के फंदे पर लटकाया गया था।  इस दिन को बलिदान दिवस के रूप पर मनाया जाता है और जेल के अलावा अन्य स्थानों पर कार्यक्रम भी होते हैं। वह फांसीघर आज भी मौजूद है। लकड़ी के फ्रेम और लीवर भी सुरक्षित हैं।

कोठरी नंबर सात में रहे थे बिस्मिल
पं.रामप्रसाद बिस्मिल को जिला कारागार लखनऊ से 10 अगस्त 1927 को गोरखपुर जेल लाया गया था। उन्हें कोठरी संख्या सात में रखा गया था। उस समय इसे तन्हाई बैरक कहा जाता था।

 

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राम प्रसाद बिस्मिल को इसी जगह दी गई थी फांसी। - फोटो : अमर उजाला

साधना केंद्र के तौर पर किए थे इस्तेमाल
गोरखपुर में आने के बाद कोठरी को चार महीने दस दिन तक बिस्मिल ने साधना केंद्र के रूप में इस्तेमाल किया था। इस कोठरी को अब बिस्मिल कक्ष और शहीद पंडित राम प्रसाद बिस्मिल बैरक के नाम से संरक्षित किया गया है।

राजद्रोह के आरोप में सुनाई गई थी फांसी
ब्रिटिश सरकार के खिलाफ राजद्रोह के आरोप में फांसी की सजा सुनाई गई थी। पंडित राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल, अशफाक उल्ला खां को फैजाबाद, रोशन सिंह को नैनी सेंट्रल जेल और राजेंद्र नाथ को गोंडा जेल में एक दिन और एक ही समय पर फांसी देने का फैसला हुआ था।

 

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