सिद्धार्थनगर जिले के बर्डपुर क्षेत्र में कालानमक धान का उत्पादन बुद्ध काल से ही होता रहा है, जो अब भी इसके उत्पादन का केंद्र माना जाता है। कहा जाता है कि महात्मा बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद कालानमक चावल की
खीर खाकर ही अपना उपवास तोड़ा था।
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कालानमक चावल की खीर। (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : अमर उजाला।
कालानमक चावल के खुशबूदार और स्वास्थ्य वर्धक होने के कारण लोगों में इसकी बहुत मांग है। बर्डपुर क्षेत्र के किसान 30 वर्ष पूर्व तक बड़े पैमाने पर कालानमक धान की खेती करते थे, लेकिन लागत की सापेक्ष बचत नहीं
होने के कारण धीरे-धीरे किसान इसकी खेती कम कर दिए हैं।
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कालानमक चावल
- फोटो : सोशल मीडिया।
किसान हीरामनी बताते है कि पहले यहां के लोग अन्य फसलों की अपेक्षा कालानमक धान की खेती करते थे, हमारे यहां गेहूं आदि फसलें बहुत कम बुवाई की जाती थी। जबकि अब पानी आदि सुविधाओं की कमी और घाटा होने के कारण मात्र पांच प्रतिशत तक ही कालानमक धान की जाती है।
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कालानमक चावल
- फोटो : सोशल मीडिया।
चिकित्सकों के अनुसार शुगर के मरीज भी कालानमक चावल का सेवन कर सकते है, इस कारण प्रदेश समेत पूरे देश में काला नमक चावल की डिमांड है।
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कालानमक चावल
- फोटो : अमर उजाला।
जिला कृषि अधिकारी सीपी सिंह ने बताया कि कालानमक धान की खेती के लिए सरकार के तरफ से किसानों को प्रोत्साहित करने की योजना संचालित है।