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इनके दम पर गोरखपुरवासी भरते हैं दम, गर्व से कहते हैं- 'हिंदी हैं हम'

Mon, 10 Aug 2020 02:54 PM IST
vivek shukla राजन राय, गोरखपुर।
राजन राय, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Mon, 10 Aug 2020 02:54 PM IST
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special story of Hindi hain hum abhiyan on Hindi divas 2020 firaq gorakhpuri and munshi premchand history
कलम के सिपाही की कर्मभूमि तो शायरी के बादशाह की जन्मभूमि है गोरक्षनगरी। - फोटो : अमर उजाला।

हिंदी सिर्फ भाषा ही नहीं है, समाज को संस्कृति से जोड़ने का बड़ा जरिया भी है। हिंदी के विकास में कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक और गीत-गजल से लेकर हिंदी फिल्मों तक की बड़ी भूमिका रही है। गोरक्षनगरी कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की कर्मभूमि रही है तो शायरी के बादशाह अजीम शायर रघुपति सहाय उर्फ फिराक गोरखपुरी की जन्मभूमि है। यहीं के प्रो. गिरीश रस्तोगी ने नाट्य कला को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। ऐसे ही कलम और अभिनय के महारथियों की बदौलत हम गर्व से कहते हैं कि हिंदी हैं हम। इस अभियान के तहत हम हिंदी प्रेमियों को कुछ ऐसी ही शख्सियत से परिचय कराएंगे।

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मुंशी प्रेमचंद। फाइल - फोटो : अमर उजाला।

गोरखपुर बनी मुंशी प्रेमचंद की कर्मभूमि
कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने जन्म भले ही लमही में लिया, लेकिन उनकी कर्मस्थली गोरखपुर ही बनी। इस शहर में मुंशी जी ने पढ़ाई की, फिर पढ़ाया भी। दो बैलों की जोड़ी, ईदगाह, रामलीला, बूढ़ी काकी, कफन, पंच परमेश्वर, गोदान, गबन जैसी उनकी कालजयी कृतियों की पृष्ठभूमि गोरखपुर में ही तैयार हुई थी। इसी शहर में उन्होंने महात्मा गांधी के आह्वान पर 1921 में अपनी नौकरी से त्यागपत्र दिया था और स्वाधीनता सेनानी बने। नार्मल स्कूल के जिस आवास में रहकर प्रेमचंद ने गोरखपुर में शिक्षा विभाग की नौकरी की, उसी में आज प्रेमचंद साहित्य संस्थान की लाइब्रेरी है।

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फिराक गोरखपुरी। (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला।

फिराक गोरखपुरी की शायरी पर हर हिंदीभाषी को नाज
मशहूर शायर रघुपति सहाय उर्फ फिराक गोरखपुरी न केवल अपनी शायरी बल्कि आजादी के आंदोलन में भागीदारी करके गोरखपुर का नाम रोशन किया, जिस पर आज भी हर जिलावासी को नाज है। फिराक साहब की उम्दा शायरी की देश दुनिया में चर्चा होती रहती है। उन्होंने अपनी शायरी से हिंदी को एक अलग पहचान दी है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। गोला तहसील के बनवारपार गांव निवासी पेशे से वकील मुंशी गोरख प्रसाद इबरत के घर फिराक गोरखपुरी का जन्म 28 अगस्त 1896 में हुआ था। फिराक साहब की प्रारंभिक शिक्षा इसी पुश्तैनी मकान से शुरू हुई। फिराक साहब के पिता पेशे से वकील थे, लेकिन शायरी में उनकी अच्छी दखल थी। इस तरह फिराक को शायरी विरासत में मिली थी, जिसे उन्होंने देश दुनिया तक पहुंचाया। फिराक गोरखपुरी हिंदी, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी और ब्रज भाषा के अच्छे जानकार थे। उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार, पद्मभूषण व साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में वह साल 1930-1959 तक अंग्रेजी के प्राध्यापक थे। फिराक गोरखपुर का निधन तीन मार्च 1982 को नई दिल्ली में हुआ था।

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दशरथ प्रसाद द्विवेदी। (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला।

जन-जन में फैला दशरथ का स्वदेश
अपने समाचार पत्र स्वदेश से स्वतंत्रता आंदोलन की क्रांति की अलख जगाने वाले पंडित दशरथ प्रसाद द्विवेदी का जन्म 1891 में डोहरिया गांव में हुआ था। थानेदार की नौकरी छोड़कर गणेश शंकर विद्यार्थी के सहायक बने द्विवेदी जी ने लंबे समय तक अपनी हिंदी लेखनी से लोगों में स्वदेश का भाव पैदा किया। तभी तो उनके समाचार पत्र स्वदेश के पहले पेज पर ‘जो भरा नहीं है भावों से, बहती उसमें रसधार नहीं, वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।’ अलग संदेश देती थी।  

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असित सेन। (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला।

हिंदी बोली से असित बने कामेडी किंग
अपनी सरलता और शानदार हास्य से चार दशक तक दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले असित सेन वैसे तो बंगाली थे, उन्होंने दुर्गाबाड़ी में चलने वाले कई बांग्ला नाटकों में अभिनय भी किया। लेकिन हिंदी बोली ने ही उन्हें कामेडी किंग बनाया। उनके पिता कोलकाता से आकर यहां बस गए। असित सेन का जन्म घोष कंपनी, गोरखपुर के लालकोठी में हुआ था। यहीं से उन्होंने बॉलीवुड का सफर शुरू किया। इसके पहले तक वह गोरखपुर में ही सेन फोटो स्टूडियो चलाया करते थे। उन्होंने 200 से अधिक बॉलीवुड फिल्मों में हास्य और चरित्र अभिनेता का किरदार निभाकर अलग पहचान बनाई।

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