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उपलब्धि: दुनिया में सबसे ऊंचा हो गया गोरखपुर खाद कारखाने का प्रिलिंग टावर, कुतुब मीनार से भी है दोगुना
Mon, 06 Dec 2021 03:25 PM IST
vivek shukla
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Mon, 06 Dec 2021 03:25 PM IST
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गोरखपुर खाद कारखाना
- फोटो : अमर उजाला।
हिंदुस्तान उर्वरक एवं रसायन लिमिटेड (एचयूआरएल) की तरफ से बनाए गए खाद कारखाने की वजह से गोरखपुर के नाम एक और बड़ी उपलब्धि दर्ज हो गई है। दुनिया भर में जितने भी यूरिया खाद के कारखाने बने हैं, उनमें गोरखपुर खाद कारखाने का प्रिलिंग टावर सबसे ऊंचा है।
गोरखपुर खाद कारखाना।
- फोटो : अमर उजाला।
खाद कारखाने के संचालन के लिए वाराणसी से गोरखपुर तक प्राकृतिक गैस की पाइपलाइन गेल ने बिछाई है। एचयूआरएल के वरिष्ठ प्रबंधक सुबोध दीक्षित ने बताया कि प्राकृतिक गैस और नाइट्रोजन के रिएक्शन से अमोनिया का लिक्विड तैयार किया जाता है। अमोनिया के लिक्विड को प्रिलिंग टावर की 117 मीटर ऊंचाई से गिराया जाता है, जिसके लिए ऑटोमेटिक सिस्टम है। अमोनिया लिक्विड और हवा में मौजूद नाइट्रोजन के रिएक्शन से यूरिया के छोटे-छोटे दाने प्रिलिंग टावर के बेसमेंट में बने छिद्रों से बाहर आते हैं। इसके बाद यूरिया के दानों पर नीम का लेप चढ़ाया जाता है। नीम कोटिंग होने के बाद उसे पैक किया जाता है।
गोरखपुर खाद कारखाना और कुतुब मिनार।
- फोटो : अमर उजाला।
कुतुब मीनार से दो गुना ऊंचा है प्रिलिंग टावर
गोरखपुर खाद कारखाने के प्रिलिंग टावर की ऊंचाई कुतुब मीनार से दोगुने से भी अधिक है। कुतुब मीनार की ऊंचाई 72.5 मीटर (237.86 फीट) है, जबकि प्रिलिंग टावर की ऊंचाई 149.5 मीटर (490.48 फीट) है। अब तक दुनिया के भीतर दूसरे नंबर का सबसे ऊंचा प्रिलिंग टावर एग्रो फर्टिलाइजर्स लिमिटेड ने पाकिस्तान के दहरकी में बनाया है। उसकी ऊंचाई 125 मीटर है, जबकि गोरखपुर खाद कारखाने की ऊंचाई इससे करीब 25 मीटर अधिक है। यूरिया प्लांट में टावर की ऊंचाई हवा की औसत रफ्तार के आधार पर तय की जाती है। इसके लिए एचयूआरएल की टीम ने करीब महीने भर हवा की रफ्तार के बारे में सर्वे किया था।
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गोरखपुर खाद कारखाना।
- फोटो : अमर उजाला।
टावर की ऊंचाई का फायदा
यूरिया के दानों के लिए देश में जो मानक तय हैं उसके मुताबिक, यूरिया के दाने 0.3 एमएम से अधिक नहीं होने चाहिए। गोरखपुर खाद कारखाने का प्रिलिंग टावर ऊंचा होने की वजह से इसमें 0.2 एमएम के दाने बनेंगे। दानों का आकार छोटा होने से वे मिट्टी में जल्दी घुलेंगे और उसका असर जल्द होगा।
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गोरखपुर खाद कारखाना।
- फोटो : अमर उजाला।