आजादी के बाद के दशक में राजनीति के आदर्श और मापदंड इतने ऊंचे थे कि देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने पद पर रहते हुए भी अपने एक रिश्तेदार को सरकारी नौकरी दिलाने में असमर्थता जता दी थी। जवाबी पत्र में अफसोस जताते हुए उन्होंने यह भी लिखा था कि इतने ऊंचे पद पर रहते हुए भी नौकरी के मामले में न तो खुद कुछ कर सकता हूं और न किसी और से करा सकता हूं।
कहानी देश के उस राष्ट्रपति की, जो रिश्तेदार की नहीं लगवा सके थे नौकरी, ऐसे जताई थी असमर्थता
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19 अगस्त 1953 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रपति भवन के लेटरहेड पर अपनी नजदीकी रिश्तेदार उमा देवी निवासी जीरादेई को जवाबी पत्र लिखा था। आशीर्वाद के साथ पत्र की शुरुआत करते हुए उन्होंने लिखा था- सरकार में नौकरी संबंधी नियम होते हैं और उन्हीं के अनुसार मंत्रियों को या अन्य अधिकारियों को भी चलना पड़ता है। नियम के विरुद्ध कोई नहीं जा सकता है। पढ़े-लिखे लोगों की संख्या काफी ज्यादा हो गई है, ऐसे में नौकरी मिलना कठिन हो गया है। बहाली करना मेरे अधिकार में नहीं है, और इसके लिए किसी से सिफारिश भी नहीं कर सकता। अफसोस जताते हुए उन्होंने आगे लिखा- इतनी ऊंची जगह रहते हुए भी नौकरी के मामले में कुछ नहीं कर सकता।
हालांकि रेलवे की नौकरी का जिक्र करते हुए उन्होंने अपनी रिश्तेदार को लिखा था कि जिसके पास नियुक्ति का अधिकार है उस विभाग के अधिकारी के नाम दरखास्त भेज दें और उसमें इस बात का जिक्र अवश्य कर दें कि उनके पिता उसी विभाग में कार्यरत थे। वे उस दरखास्त को संबंधित अधिकारी को भेज देंगे।
साथ ही उन्होंने यह बात भी लिखी थी कि इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं कर सकते कि नियुक्ति हो ही जाएगी, लेकिन यह हो सकता है कि राष्ट्रपति भवन से पत्र जाने पर उस अधिकारी का ध्यान उस ओर चला जाए। पहले राष्ट्रपति की जयंती पर तीन दिसंबर को व्यापार मंडल के पदाधिकारी मनीष सक्सेना ने यह पत्र अमर उजाला को उपलब्ध कराया। उनको यह पत्र डॉ. राजेंद्र प्रसाद के एक करीबी रिश्तेदार ने उपलब्ध कराया था।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद के प्रपौत्र डॉ. अशोक कुमार ने बताया कि राजनीति में डॉ. राजेंद्र प्रसाद के आदर्श बहुत उच्च थे। सिफारिश आदि करना उन्हें कभी पसंद नहीं रहा। उन्होंने अपने परिवार के किसी सदस्य के लिए पैरवी नहीं की। सरकारी नौकरी के दौरान नियम विरुद्ध काम करने के लिए अपने परिवार के एक सदस्य के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश भी कर दी थी।