पर्स रखने का चलन कई सालों से चला आ रहा है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में पर्स के डिजाइन और आकार में कई बदलाव हुए हैं, लेकिन इन पर्सों का इतिहास बेहद दिलचस्प है।यह महज एक खबर नहीं है कि हाल के दिनों में दुनिया भर की शौकीन महिलाओं ने जो पर्स खरीदें हैं, वह मर्लिन मुनरो ब्रांड है। मर्लिन मुनरो जैसी सदाबहार अभिनेत्री के नाम से जुड़ा पर्स रखना शान की निशानी तो है ही, यह पर्स के प्रति प्यार की कहानी भी है। महिलाओं के बीच दुनिया भर में पर्स को लेकर दीवानगी है और पर्स की भी एक अलग दुनिया है।
बाजार हो, ऑफिस हो या फिर कहीं घूमना-फिरना, बिना पर्स के किसी महिला की कल्पना करना मुश्किल होगा। हमें अपने आसपास शायद ही ऐसी कोई महिला दिखे, जिनके पास पर्स न हो। पर्स महिलाओं की जीवनशैली का एक अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। आज पर्स न सिर्फ हर औरत की जरूरत है, बल्कि अब यह एक फैशन एक्सेसरीज और स्टेटस सिंबल भी बन चुका है।
शोध से पता चला है कि कि 17वीं सदी से पहले तक कपड़ों में जेब नहीं हुआ करती थी। इसलिए रुपयेे और अपनी निजी वस्तुएं रखने के लिए महिला और पुरुष दोनों ही थैले का इस्तेमाल करते थे। इस दौर में पूर्व और पश्चिम देशों पर मध्य-पूर्वी देशों का प्रभाव बढ़ रहा था और इसके परिणामस्वरूप इन देशों में डोरी वाले पर्स अस्तित्व में आए।
इन थैलों को डोरियों और लटकन से सजाया जाने लगा, ताकि वे देखने में खूबसूरत लगें। भारत में लटकन के अलावा इन थैलों पर धागों से कढ़ाई करने का चलन था। इससे ये थैले और खूबसूरत लगते थे। मुगल शासन के दौर में इन्हें बटुआ और पोटली के नाम से जाना जाता था। यही वह समय था जब इसे एक फैशन एक्सेसरी के नजरिए से देखने की शुरुआत हुई। उस समय पर्स कई उद्देश्यों के लिए विभिन्न प्रकार के डिजाइनों में आते थे जैसे कि बकल्स वाले बैग, चमड़े के पाउच और लंबी डोरी वाले पर्स।
कंधे पर लटकाने वाले कुछ बैगों के अलावा कई पर्स बैल्ट या कमरपेटी से जुड़े होते थे। कपड़ों में जेब आने के बाद से धीरे-धीरे पुरुषों के पर्स गायब हो गए और तब से पर्स पर महिलाओं का अधिकार ज्यादा दिखने लगा।