'यमला पगला दीवाना फिर से' को दर्शकों-समीक्षकों ने खारिज कर दिया। कमजोर कहानी और लचर अभिनय ने सबको दुखी किया। लोग हैरान हैं कि ऐसा क्या है जो सितारा हैसियत करोड़ों फैन्स और धन-संपदा की चिंता न होने के बावजूद धर्मेंद्र और उनके दोनों बेटे लगातार नाकाम हैं। साल 2000 के बाद से सनी-बॉबी ने 50 से ज्यादा फ्लॉप फिल्में दी हैं...
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फ्लॉप फिल्में देने के मामले में सनी-बॉबी ने लगाई फिफ्टी, यह रहा बीते 18 साल का पूरा ब्योरा
रवि बुले
Updated Tue, 04 Sep 2018 09:24 PM IST
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सनी देओल और बॉबी देओल
yamla pagla deewana
रिकॉर्ड बताते हैं कि इनकी आखिरी सफल फिल्म 'यमला पगला दीवाना' 2011 में आई थी। इसके बाद धर्मेंद्र 'टैल मी ओ खुदा', 'यमला पगला दीवाना-2' और 'सेकेंड हेंड हस्बेंड' में दिखे। तीनों फ्लॉप थीं। बॉबी देओल 'यमला पगला दीवाना-2', 'पोस्टर बॉय्ज' तथा 'रेस-3' में आए। 'रेस-3' में सारा श्रेय सलमान का था और बाकी दो फिल्में फ्लॉप थीं। सनी 2011 के बाद 'यमला पगला दीवाना-2' 'सिंह साब द ग्रेट' 'डिश्क्यांऊ', 'आई लव एनवाई', 'घायल वंस अगेन' और 'पोस्टर बॉय्ज' में आए और सभी नाकाम रहीं।
yamla pagla deewana 2
कुल हिसाब यह कि देओल परिवार के तीनों सदस्यों को लगातार नाकामियां झेलनी पड़ रही हैं। जबकि तीनों के फैन्स की संख्या करोड़ों में है। तब भी इनकी फिल्में क्यों नहीं चल पा रहीं, इसके कुछ सरल कारण दिखते हैं। धर्मेंद्र की उम्र हो चली है और वह अधिक काम नहीं करते। सनी देओल अपनी ढाई किलो के हाथ वाली इमेज से बाहर निकलना नहीं चाहते। बीच में उन्होंने 'काशी का अस्सी' जैसी फिल्म में गंभीर काम करने की कोशिश की परंतु निर्माता से विवाद में फिल्म अटक गई।
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बॉबी देओल
बॉबी स्टारडम की रेस से बाहर हैं परंतु इसे स्वीकारने को तैयार नहीं हैं। उनकी हर वापसी पिछली बार से खराब होती है। उन्हें लेकर निर्देशकों-लेखकों ने सोचना ही छोड़ दिया है। बॉबी को भले ही इस बात का एहसास न हो परंतु सनी मीडिया से बातचीत में हैरानी जता चुके हैं कि क्या वजह है, जो लेखक-निर्देशक से कहां गड़बड़ हो गई।
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bobby deol
जानकारों के अनुसार खुद देओल बंधुओं को अपनी विफलताओं के बारे में गहराई से सोचने का समय आ गया है क्योंकि अब उनकी नई पीढ़ी पर्दे पर आने को तैयार है। इस विफलता की छाया से उसे दूर रखने के लिए समय से ताल मिलाना जरूरी है। इंडस्ट्री में देओल ज्यादा घुलते-मिलते नहीं हैं। खेमेबाजी और राजनीति से दूर रहते हैं। नए लेखकों-निर्देशकों की उन तक पहुंच नहीं है। वह ऐसे लोगों से घिरे हैं जो उन्हें नाकामियों की हकीकत देखने नहीं देते।