इन दिनों नंबी नारायण का नाम काफी चर्चाओं में बना हुआ है। लेकिन क्या आप जानते हैं कौन हैं नंबी नारायण, जिन पर पाकिस्तान के लिए जासूसी करने का आरोप लगा था और बाद में यही नंबी देश के लिए मिसाल बने थे। उनके जीवन से जुड़ी इन्हीं कहानियों पर जल्द ही एक फिल्म रॉकेट्री द नांबी इफेक्ट रिलीज होने वाली है। तो चलिए आज हम आपको नंबी नारायण के जीवन और उनसे जुड़ी रोचक बातों के बारे में बताते हैं।
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नंबी नारायण
- फोटो : Social media
पढ़ने के शौकीन थे नंबी
नंबी नारायणन का जन्म केरल राज्य के एक गांव मे नागरकोइल में हुआ था। उन्होंने इसरो में बतौर क्रायोजेनिक डिवीजन अधिकारी काम किया। उन्हें आज एक सैटेलाइट वैज्ञानिक के रूप में जाना जाता है। एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे एस नंबी नारायणन को पढ़ने का काफी शौक था। उन्होंने शिक्षा को अहमियत दी और तिरुवनंतपुरम के एक कॉलेज से एम.टेक किया। पढ़ाई करने के बाद उन्होंने देश के लिए कुछ करने का विचार बनाया।
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भ्रष्टाचार और जासूसी का लगा आरोप
नंबी नारायणन ने भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो में आवेदन किया और उनका आवेदन स्वीकार भी कर लिया गया। इसके बाद उन्होंने कई खोज कीं। एक समय आया जब उनके जीवन में अंधेरा छा गया। भ्रष्टाचार और जासूसी के आरोप लगाकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। हालांकि बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया। यह घटना साल 1994 की है, जब नारायणन पर दो अधिकारियों ने आरोप लगाए थे कि वह रॉकेट व उपग्रह से संबंधित गोपनीय जानकारी भारत के बाहर भेजते हैं। बता दें कि जिस लॉन्च के समय उनपर आरोप लगा था उसको उड़ान परीक्षण डेटा के नाम जाना जाता है।
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सीबीआई की जांच में पाए गए निर्दोष
नंबी नारायणन पर जो भी आरोप लगे वे सीबीआई की जांच में गलत साबित हुए। सीबीआई ने कहा था कि भारत की स्पेस एजेंसी के प्रोग्रामों को नष्ट करने के लिए उन पर झूठे आरोप लगाए गए थे। अगर कुछ लोगों की माने तो कहा जाता है कि उन्होंने किसी बड़े ऑफर को ठुकरा दिया था, जिसके बाद अमेरिका के इशारों पर उन्हें फंसाया गया था। साल 1996 में केरल की अदालत ने उन्हें निर्दोष साबित कर रिहा कर दिया।
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नासा से मिला था बड़ा ऑफर
नंबी नारायणन के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और वे अपने काम में लगे रहे। नंबी को अमेरिका की स्पेस एजेंसी नासा ने भी काम करने के लिए ऑफर दिया था और वे कुछ हद तक राजी भी हो गए थे। बाद में कुछ कारणों की वजह से वह नासा के साथ काम नहीं कर सके। नंबी नारायणन को उनकी खोज की वजह से भारत सरकार की ओर से पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।