पूरा देश आजादी के 75 साल के जश्न में डूबा हुआ है। लंबी लड़ाई के बाद हासिल हुई इस आजादी को 75 साल पूरे हो चुके हैं। इस खास मौके पर हर कोई जश्न और खुशी मनाता दिख रहा है। सन 1947 में भारत को मिली आजादी के साथ ही देश को ऐसा घाव भी मिला, जो शायद कभी ना भर पाए। बंटवारे के बाद हुए दंगों और उसके बाद लोगों के विस्थापन को इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी माना जाता है। उस दौरान उस दर्द को महसूस करना आज के लोगों के लिए नामुमकिन है, लेकिन उस दर्द को लोगों तक दिखाने का काम सिनेमा ने बखूबी किया है। आजादी के मौके पर जानते हैं बॉलीवुड में बनी फिल्मों के बारे में जिसमें दंगे और बंटवारे के गहरे घाव और दर्द को दिखाया गया है।
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गरम हवा
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गरम हवा
विभाजन के बाद देश के हालात किस तरह बदले और बिगड़े इस बारे में कई अखबारों और किताबों में पढ़ने को मिला है, लेकिन उस दौर पर कई फिल्में भी बनी हैं। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा में आई फिल्म गरम हवा थी, जो विभाजन के करीब 25 साल बाद रिलीज हुई 1973 में आई। फिल्म गरम हवा इस्मत चुगताई की एक लघु कथा पर आधारित थी, जिसकी पटकथा कैफी आजमी और शमा जैदी ने लिखी थी। बंटवारे और महात्मा गांधी की हत्या के बाद बदले हालातों पर बनी यह फिल्म खासतौर पर उत्तर भारत के मुस्लिम व्यापारियों के दर्द को बयां करती है।
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तमस
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तमस
भीष्म साहनी का उपन्यास तमस उनके सबसे लोकप्रिय उपन्यास में से एक है। अपने इस उपन्यास के लिए उन्हें साहित्य अकादमी सम्मान भी मिला था। इस उपन्यास पर बनी फिल्म तमस निर्देशक गोविंद निहलानी के करियर की बेहतरीन फिल्म थी। साल 1988 में आई फिल्म तमस राष्ट्रीय एकता पर आधारित थी। बंटवारे के दौरान हुए दंगों की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में सांप्रदायिक दंगे भड़काने से लेकर उस पर होने वाली राजनीति तक सब कुछ दिखाया गया है। फिल्म में दंगों के माहौल में पाकिस्तान में फंसे हिंदू और सिख परिवारों के दर्द को भी बखूबी दिखाया गया है।
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ट्रेन टू पाकिस्तान
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ट्रेन टू पाकिस्तान
1956 में खुशवंत सिंह के लिखे उपन्यास ट्रेन टू पाकिस्तान पर आधारित इसी नाम की फिल्म भारत-पाकिस्तान सीमा बसे एक काल्पनिक गांव मनो माजरा पर आधारित है। फिल्म में दिखाया गया यह एक ऐसा शांत गांव है, जहां सिख और मुसलमान वर्षों से प्रेम भाव से रह रहे हैं। लेकिन जब देश का बंटवारा होता है तो सांप्रदायिक दंगों में यह गांव और उसकी शांति सब कुछ खत्म हो जाता है। फिल्म की कहानी पूरी तरह झकझोरने वाली है, जिसे देख यह एहसास होता है मानो सब कुछ आंखों के सामने ही हो रहा है।
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पिंजर
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पिंजर
साल 2003 में आई फिल्म पिंजर बंटवारे के दौरान हुई हिंदू-मुस्लिम की समस्याओं पर आधारित है। फिल्म की शुरुआत में जहां हिंदू मुस्लिम की दुश्मनी दिखाई गई है तो वहीं इसके अंत में दोनों की प्रेम से दिखाया गया है। यह फिल्म पंजाबी साहित्य की विख्यात लेखिका अमृता प्रीतम इसी नाम इन पंजाबी उपन्यास पर आधारित है। इसका निर्देशन और लेखन चाणक्य सीरियल से मशहूर हुए चंद्र प्रकाश द्विवेदी ने किया है। फिल्म में उर्मिला मातोंडकर और मनोज बाजपेयी मुख्य किरदार में हैं।