लॉकडाउन के दो महीने पूरे हो चुके हैं। कभी न रुकने वाली मुंबई थम सी गई है। संघर्षशील कलाकारों के इलाके आराम नगर की गलियों में हर दिन अपनी किस्मत को चुनौती देने वालों को अब किराये के कमरों में अपना भविष्य अंधेरे में जाता नजर आ रहा है। महाराष्ट्र सरकार का आदेश है कि तीन महीने कोई मकान मालिक किरायेदार से पैसे नहीं मांगेगा लेकिन हकीकत में एडवांस का पैसा खत्म होते ही मकान मालिक इन कलाकारों से कमरा छोड़ने को कह रहे हैं।
Ground Report: किराये के घरों में फंसे कलाकारों की हालत खस्ता, शुरू न हुई शूटिंग तो बिगड़ेंगे हालात
जयपुर के रहने वाले राघव तिवारी बीते कुछ सालों से लगातार मुंबई में काम कर रहे हैं। उनके हाथ आयुष शर्मा की फिल्म 'क्वाथा' में एक कैरेक्टर भी लग गया था लेकिन लॉकडाउन के चलते प्रोजेक्ट आगे खिसक गया है। वह बताते हैं, 'पिछले दो महीने में सभी काम स्थगित हो गए हैं और पुराने काम के पैसे भी लटके पड़े हैं। सिनटा अपने सदस्यों को मदद पहुंचा रहा है लेकिन इनसे जुड़ना काफी महंगा है। इनकी सदस्यता के लिए करीब 35 हजार रुपये लगते हैं जो कि शुरुआती कलाकारों के लिए मुमकिन नहीं हैं। वहीं इसका सदस्य बनने के लिए आपको छह एपिसोड या एक फिल्म में काम करना जरूरी है। सोशल मीडिया पर भी मैंने काफी गुहार लगाई लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ।'
उत्तर प्रदेश में शाहजहांपुर के रहने वाले और 'बेबी', 'नीरजा', 'द अटैक ऑफ 26/11' में नजर आ चुके और जल्द ही फिल्म 'शेरशाह' में पाकिस्तानी अफसर के किरदार में नजर आने वाले रहाओ बताते हैं कि मकान मालिक सिर्फ तभी तक नहीं बोल रहे हैं जब तक वह एडवांस दिए पैसे को किराए में एडजस्ट कर सकते हैं। वह खत्म होते ही वह किराए के लिए दबाव बना रहे हैं। बीते दिनों मैंने ही ऐसे ही कुछ दोस्तों का सामान अपने घर पर रखा है। बड़े बैनर वालों की तरफ से भी कोई मदद नहीं पहुंच रही है हालांकि आपस में लोग जरूर एक दूसरे की मदद कर रहे हैं।
कोंकणा सेन शर्मा के साथ फिल्म 'स्कॉलरशिप' और बीते दिनों फिल्म 'तानाशाह' में नजर आ चुके नंद राम का कहना है कि अगस्त में काम शुरू होने की सुगबुगाहट है लेकिन सुरक्षा के लिहाज से मेरे अनुसार यह उचित फैसला नहीं होगा। मुंबई के ज्यादातर स्ट्रगलिंग एक्टर्स वर्सोवा विलेज की तरफ ही रहते हैं। जहां बीते दिनों दर्जन भर से अधिक केस सामने आ चुके हैं , इस वजह से यहां जगह जगह बैरिकेडिंग कर दी गई है। यहां बहुत ही तंग गलियां हैं और यहां पर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं हो पाता है जो खतरे का सूचक है।
'सौभाग्यवती भव', 'मिसेस पम्मी प्यारेलाल', 'संस्कार' और 'विघ्नहर्ता गणेश' जैसे टीवी शोज में काम कर चुकी सूरत की सुलग्ना बताती हैं, 'देश में करीब डेढ़ से दो करोड़ लोग फ्रीलांस काम करते हैं। इनका किसी न किसी तरह से उत्पीड़न होता रहा है। लॉक डाउन में तो ऐसे कलाकारों की परिस्थितियों का अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता है।'
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