दिल्ली में मेट्रो भी है और बस भी। ई-रिक्शा से कैब तक की सेवाएं भी मौजूद हैं। सार्वजनिक परिवहन के तकरीबन सभी साधन यहां मौजूद हैं। सब अपनी-अपनी सहूलियत के हिसाब से इन पर सफर भी करते हैं। फिर भी, लोगों का एक ही दूरी तय करने में लगने वाले समय व किराए में जमीन-आसमान का फर्क है। अमर उजाला के संवाददाताओं ने दिल्ली की अलग-अलग दिशाओं से गोल मार्केट तक का सफर किया। रास्ते की सहूलियतों और परेशानियों को नजदीक से समझा। पेश है रिपोर्ट...
चलती दिल्ली: समय पर पहुंचने के लिए ढीली करें जेब
द्वारका से खर्च कम लेकिन लगता है डेढ़ गुना वक्त
करीब सुबह 9.45 बज रहे थे। द्वारका सेक्टर-6 से बस स्टॉप तक आने में करीब दस मिनट का वक्त लगा। इसका किराया दस रुपये बैठता है।करीब 10 मिनट बाद रूट संख्या 803 की बस पहुंची तो चार यात्रियों को प्रवेश मिल सका। बस मधु विहार से शिवाजी स्टेडियम के बीच का सफर करवाती है। बस स्टाप से यह करीब करीब 10.05 में बस रवाना हुई।
सागरपुर, मायापुरी, नारायणा डिपो, शादीपुर, पटेल नगर, राजेन्द्र प्लेस, करोल बाग, झंडेवाला के बाद बस गोल मार्केट पर करीब 11.35 बजे पहुंची। इस बीच मायापुरी व शादीपुर मेट्रो स्टेशन के नजदीक जाम भी मिला। इससे निकलने में बस को करीब पंद्रह मिनट का वक्त लगा। जबकि पांच छोटे सिग्नल पर 10 मिनट से ज्यादा का समय जाया हुआ। गोल मार्केट पहुंचने में 11.35 बजे बस पहुंची। करीब 25 किलोमीटर का द्वारका से गोल माकेर्ट का सफर तय करने में करीब पौने दो घंटे का वक्त लगता है। पूरी दूरी 35 रुपये के खर्च पर पूरी हुई।
दूसरे माध्यम से होने वाले सफर
मेट्रो का सफर करीब एक घंटे में 100 रुपये में पूरा होता है।
कैब की सेवा लेने पर करीब 300 रुपये चुकाने पर पड़ते हैं।
सीएनजी कार से 40 रुपये और पेट्रोल की कार से करीब 100 रुपये का खर्चा होता है।
लक्ष्मी नगर से गोल मार्केटः 10 किलोमीटर की दूरी में बस से लगा एक घंटा
सुबह करीब 10 बजे, लक्ष्मी नगर बस स्टॉप, करीब दस मिनट इंतजार के बाद आनंद विहार से सुलतानपुर टर्मिनल जाने वाली रूट नंबर 943 की दिखी। बस चली भी, लेकिन पीक आवर्स में सड़क पर वाहनों का दबाव बस की चाल पर भारी पड़ा। एक के बाद एक दो सिग्नल पार करने में ही पंद्रह मिनट का वक्त लग गया। आगे बस ने रफ्तार पकड़ी, लेकिन आईटीओ पुल क्रास करते ही दुबारा चाल पर ब्रेक लगा। रिग रोड फ्लाईओवर की लाल बत्ती से आईटीओ तक वाहनों की लंबी लाइन लगी रही। करीब 700 मीटर के इस हिस्से का पार करने में बीस मिनट लगा।
आईटीओ से आगे बढ़ने भाजपा दफ्तर तक कोई अवरोध नहीं मिला। पहला ब्रेक यहां के सिग्नल पर लगा। यहां से पार होने ही मिंटो रोड की लाल बत्ती पर दूर तक वाहन खड़ मिले। करीब पांच मिनट तक रेंगने के बाद बस कनॉट प्लेस सर्किल पर पहुंचे। वाहनों के दबाव से बस की चाल नहीं बढ़ सकी और रेंगते हुए वह बाबा खडग सिंह मार्ग पहुंची। कनॉट प्लेट की सर्किल की तीन लाल बत्तियों पर भी करीब दस मिनट का समय जाया हुआ। आगे गोल डाकखाना, गोल मार्केट होती हुई बस करीब 11 बजे उद्योग मार्ग रेड लाइट पर पहुंची। हालांकि, एक रूट की बस होने से पूरे सफर का किराया सिर्फ 15 रुपये लगा।
आवाजाही के दूसरे माध्यम:
मेट्रो का विकल्प लेने पर उद्योग मार्ग तक पहुंचने में 30 रुपये के किराए पर 20-25 मिनट का वक्त लगता है।
कैब उद्योग मार्ग तक 150 रुपये में 45 मिनट पहुंचाती है।
सीएनजी कार का खर्च करीब 15 रुपये व पेट्रोल की कार से 45 रुपये का खर्च होता है। वहीं, समय करीब 45 मिनट लगता है।
पांचवां पुस्ताः हर वाहन की अपनी चाल
अब यहां से बस को पकड़ने की जद्दोजहद शुरू हुई। बस स्टैंड पर करीब 20 मिनट के इंतजार के बाद आईएसबीटी कश्मीरी गेट के लिए बस मिली। पुश्ता से करीब आठ किमी की दूरी 45 मिनट में पूरी हुई। इसका किराया भी दस रुपये लगा। बस छोड़ने के बाद अभी सफर का पहिया थम नहीं था। दस मिनट के इंतजार के बाद बस अड्डे से रुट नंबर 729 की बस पकड़ सफर का तीसरा पड़ाव बनी।
इस बस से नौ किमी दूर गोल डाकखाना पहुंचने में 50 मिनट का समय लगा। हालांकि, किराया इसका भी 10 रुपये था। गोल डाकखाना से उद्यान मार्ग तक पैदल पहुंचने में करीब पंद्रह मिनट का समय लगा। सफर पूरा करने में 1.30 घंटे से ज्यादा का समय लग गया।
आवाजाही के दूसरे माध्यम:
मेट्रो से सफर सफर करने पर 40 मिनट में 45 रुपये खर्च करने पड़ेंगे।
कैब से सफर का विकल्प लेने पर 50 मिनट में 200 रुपये में पहुंचा जा सकता है।
सीएनजी की निजी कार से 25 रुपये व पेट्रोल से 80 रुपये से ज्यादा खर्च होता है।
एक्सपर्ट ने कहा: पानी-बिजली की तरह परिवहन को भी मिले तवज्जो
पानी व बिजली की तर्ज पर अब परिवहन को भी प्राथमिकता में लाना है। नीतिगत बदलाव के साथ बजट भी बढ़ाना पड़ेगा। सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल तभी होगा, जब सुविधाएं बेहतर होंगी। समय का ध्यान रखा जाएगा। उपलब्धता बढ़ाने के साथ इसके लिए हाई आक्यूपेंसी व्हीकल लेन (बस, टैक्सी, ऑटो) बनाए जा सकते हैं। इसके साथ सिग्नल की प्राथमिकता पर भी ध्यान देना होगा। इससे सार्वजनिक वाहन ज्यादा देर तक सिग्नल पर नहीं रूकेंगे। फिलहाल हैदराबाद में प्रयोग के तौर पर इसे शुरू किया गया है।
मेट्रो से भी कम वक्त में अधिक दूरी तय की जा सकती है। अगर परिवहन क्षेत्र को बुनियादी सेवाओं के तौर पर लेते हुए बजट में बढ़ोतरी की जाए तो इससे परिवहन के तमाम विकल्पों को बेहतर किया जा सकेगा। टैक्सी में शेयरिंग और कार पूल को बढ़ावा देने से भी निजी वाहनों की संख्या कम होगी। लोगों को दफ्तर, संस्थान या किसी भी जरूरी काम के सिलसिले में आवागमन में परेशानियां कम होंगी और परिवहन के मद में खर्च भी कम होगा।
खर्च के हिसाब से बात करें तो बस से एक किलोमीटर की दूरी पर पांच रुपये में पूरी होती है। मेट्रो में 10 रुपये व बाइक से करीब दो रुपये प्रति किलोमीटर है। अलग अलग परिवहन विकल्पों के इस्तेमाल पर होने वाले खर्च में अंतर को कम करने पर सरकार को ध्यान देना है।
-जैसा परिवहन विशेषज्ञ सायन रॉय, सेंटर फॉर साइंस एंड इनवॉयरमेंट (सीएसई) ने बताया