सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले में वीकेंड पर उमड़े दर्शकों को बड़ी चौपाल पर देश विदेश के लोकजीवन और संस्कृति के दर्शन हुए। आठ राज्यों के कलाकारों ने लोकगीत और नृत्य के जरिए अपनी संस्कृति का प्रदर्शन किया तो विदेशी मेहमानों ने अपनी भाषा और नृत्य शैली में दर्शकों का मनोरंजन किया।
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- फोटो : अमर उजाला
पंजाब के कलाकारों ने भंगड़ा और जिंडवा प्रस्तुत कर दर्शकों को पंजाबी जोश खरोश से रूबरू कराया तो राजस्थान के कलाकारों ने कालबेलिया और भवाई नृत्य से दर्शकों को राजस्थानी लोक संस्कृति से परिचित कराया। जम्मू कश्मीर के कलाकारों ने बसंत के स्वागत में गाए जाने वाले रॉफ लोकगीत और नृत्य से दर्शकों का मन मोह लिया।
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हिमाचल प्रदेश के कलाकारों ने सिरमोरी नाटी और उत्तराखंड के कलाकारों ने चपाली और घरिआरी नृत्य प्रस्तुत किए। महाराष्ट्र का सोंग मेंखाटे गुजरात का पीपनी और थीम स्टेट उत्तर प्रदेश का पाई डांडा लोक नृत्य भी आकर्षण का केंद्र रहा। इनके अलावा मेले में विदेशी कलाकारों ने भी अपनी प्रस्तुति दी।
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सूरजकुंड मेले में सपेरा जाति का परिवार दर्शकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। बीन और तुंबा यंत्र से छेड़ी गई मधुर सुन दर्शक ठिठक जाते हैं। बीन की मदहोश करने वाली ताल और तुंबा की ताल का संगम श्रोताओं को दूर से ही आकर्षित कर रहा है। मेले में सपेरा जाति की जीवनशैली और लोककला का प्रदर्शन कर रही पांच सदस्यीय पार्टी का नेतृत्व कर रहे नाथ कर रहे हैं।
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उन्होंने बताया कि ये उनका पुश्तैनी काम है। बीन और तुंबे पर देश भक्ति, नागिन धुन सहित कई विभिन्न प्रकार की धुनें बजाकर लोगों का मनोरंजन करते हैं। उनके परिवार के बुजुर्ग भी यही काम करते थे। जब से सृष्टि की रचना हुई है। तभी से सपेरा जाति ने बीन की धुन बजानी शुरू की थी। उनकी टीम कुरुक्षेत्र के गीता जयंती महोत्सव में भी प्रस्तुति दे चुकी है।