उत्तराखंड में बीते दो दशक में विकास परियोजनाओं की अंधाधुंध दौड़ और बेतरतीब पर्यटन वृद्धि ने हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर संकट में डाल दिया है। जहां एक ओर 1.85 लाख हेक्टेयर यानी 1,850 वर्ग किलोमीटर जंगलों की कटाई ने पहाड़ों की जलधारण क्षमता और जैव विविधता को कमजोर किया है, वहीं दूसरी ओर पर्यटकों की संख्या तीन गुना बढ़कर 5 करोड़ के पार पहुंच गई है, जिससे पर्वतीय इलाकों पर असहनीय दबाव पड़ा है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि उत्तराखंड में भूस्खलन, जल स्रोतों का सूखना, ग्लेशियर पिघलाव और पारिस्थितिकीय असंतुलन की घटनाएं इसी दोहरे दबाव का परिणाम हैं जिसका असर गंगा-यमुना के मैदानों तक फैल चुका है।
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उत्तरकाशी में बादल फटने से तबाही
- फोटो : पीटीआई
1.85 लाख हेक्टेयर वन भूमि विभिन्न विकास कार्यों के लिए डायवर्ट की
उत्तराखंड वन विभाग और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2005 से 2025 के बीच करीब 1.85 लाख हेक्टेयर वन भूमि विभिन्न विकास कार्यों के लिए डायवर्ट की गई है। यह क्षेत्र दिल्ली (1,484 वर्ग किमी) से बड़ा और गोवा (3,702 वर्ग किमी) का लगभग आधा है।
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उत्तरकाशी में बादल फटने से तबाही
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सड़क निर्माण, चारधाम परियोजना, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन, ट्रांसमिशन लाइनें और खनन इन वनों की कटाई के मुख्य कारण रहे हैं। राज्य का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 53,483 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें से 24,305 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल करीब 45.46% वन आच्छादित है।
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उत्तरकाशी में बादल फटने से तबाही
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20 वर्षों में 1,850 वर्ग किलोमीटर जंगलों की कटाई का अर्थ है कि राज्य ने अपने कुल वनों का 7.6% हिस्सा खो दिया है।
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उत्तरकाशी में बादल फटने से तबाही
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संतुलन साधना जरूरी
पर्यावरणविद डॉ. अनुज जोशी चेताते हैं, विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन साधे बिना पहाड़ों से इस तरह जंगलों का गायब होना हिमालय की स्थिरता के लिए विनाशकारी है। यदि यही स्थिति रही तो उत्तराखंड में गंगा और यमुना के मैदानों तक आपदाओं की तीव्रता महसूस होगी।