नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ जामिया विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा किए जा रहे सत्याग्रह को शुक्रवार के दिन देशभर के महिला संगठनों का साथ भी मिला। समाज के दबे कुचले वर्ग और दलितों के लिए आवाज उठाने वाली सावित्री बाई फुले के जन्मदिवस पर महिला फेडरेशन, जामिया और जेएनयू स्टूडेंट एसोसिएशन, नॉर्थ ईस्ट यूनाइटेड जस्टिस एण्ड पीस फेडरेशन, ट्रासजेंडर कम्यूनिटी और बिरसा-फुले स्टूडेंट एसोसिएसन से जुड़े लोगों, खासकर महिलाओं ने सीएए और केन्द्र सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद की। लोग सावित्री बाई फुले और अंबेडकर की तस्वीरें थामे पैदल मार्च का हिस्सा बने। इस दौरान जामिया स्टूडेंट्स यूनियन द्वारा रोजाना किए जा रहे प्रदर्शनों और उनके तरीकों में कुछ न कुछ अनूठापन नजर आता है। शुक्रवार को भी प्रदर्शन में लोगों ने पाश और फैज की नज्में लिखी चादरें फैलाकर पैदल मार्च निकाला।
सीएएः बूम-बूम-बूम, पाश और फैज की नज्में बनी प्रदर्शनकारियों का हथियार, ट्रांसजेंडर समुदाय भी सड़क पर
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छात्र संगठन 'बोल के लब आजाद हैं तेरे' के नारे बुलंद करते हुए आगे बढ़ रहे थे। मनुवाद, सीएए, एनपीए, एनआरसी और केन्द्र सरकार से आजादी की मांग कर रहे थे। कह रहे थे, कि उन्हें धार्मिक आधार पर नागरिकता नहीं चाहिए। कौमी एकता जिंदाबाद, सावित्री बाई फुले कोयाद करेंगे, जुल्म नहीं बर्दास्त करेंगे, के नारे लगाए जा रहे थे। मंडी हाउस से छात्रों का कारवां बढ़ता गया और उसके साथ प्रत्येक चौराहों पर लोग जुड़ते गए।
बूम बूम बूम- ध्यान से सुनो से खींचा ध्यान
संगवारी थियेटर ग्रुप ने बूम बूम बूम- ध्यान से सुनो गाकर केन्द्र सरकार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की। छात्रों ने मंहगाई, संघ, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, मंदी, बेरोजगारी, एनआरसी, पीएनबी घोटाला, मेहुल चौकसी और अंबानी की याद दिलाई। सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ अपनी आवाजें हमेशा बुलंद रहने का वादा किया। कहा कि सरकार के जुल्म से उनका सत्याग्रह और मजबूत हो गया है।
छात्रों को ट्रांसजेंडर समुदाय का साथ भी मिला
जामिया स्टूडेंट्स यूनियन के सत्याग्रह को ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों का साथ भी मिल चुका है। शुक्रवार के पादल मार्च में ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग भी शामिल हुए। ट्रांसजेंडर बिट्टू ने कहा कि वह इसलिए यहां पर हैं, क्योंकि हिजड़ा समाज इस चीज को भली भांति समझता है कि भेदभाव क्या होता है। उन्होंने कहा कि एनआरसी की वजह से सर्वाधिक नुकसान हिजड़ा समाज का ही होगा। क्योंकि वह अपनी नागरिकता कभी सिद्ध कर ही नहीं सकते। ज्यादातर के माता पिता ने उन्हें घर सो बेघर कर दिया है, कइयों ने स्वयं ही अपना घर बार छोड़दिया है।
सावित्री बाई फुले का सपना पूरा हो रहा है
सावित्री बाई फुले के जन्मदिन के मौके पर निकाले गए इस सत्याग्रही पैदल मार्च के बाद महिला संगठनों ने कहा कि वर्षों पहले सावित्री बाई फुले और फातिमा शेख का द्वारा देखा गया सपना पूरा होता नजर आ रहा है। पिछले 22 दिनों से जामिया का प्रदर्शन का नेत्रृत्व महिलाएं कर रही हैं।