दिल्ली-एनसीआर की आबोहवा में लगातार जहर बढ़ता जा रहा है। शुक्रवार को पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण(ईपीसीए) ने दिल्ली-एनसीआर में हेल्थ इमरजेंसी घोषित कर दी है। इसके तहत दिल्ली के सभी स्कूलों को बंद रखने का आदेश भी मुख्यमंत्री केजरीवाल ने जारी कर दिया है। प्रदूषण के मामले में दिल्ली-एनसीआर के अधिकतर शहरों का हाल बहुत बुरा है। इसके ज्यादातर शहर टॉप-10 में शामिल हैं।
दिल्ली-NCR: अब नहीं जागे तो भुगतने होंगे गंभीर परिणाम, इन पांच फैसलों से कम हो सकता है प्रदूषण
इन पांच फैसलों से बन सकती है बात
1:- सम-विषम फॉर्मूला होगा असरदार
सम-विषम का फॉर्मूला दिल्ली में असरदार साबित हो सकता है तो इसे एनसीआर के अन्य शहरों पर लागू क्यों नहीं किया जा सकता। एक दिन सम और एक दिन विषम नंबर के वाहनों के संचालन का नियम बड़ी राहत देने वाला साबित हो सकता है। एक अनुमान के मुताबिक ऐसा करने से सड़कों पर वाहनों की संख्या घटकर आधी रह जाएगी।
2:-शिफ्ट और अवकाश में हो बदलाव
दिल्ली-एनसीआर के सरकारी दफ्तर हों या फिर निजी कंपनियां। साप्ताहिक अवकाश का दिन एक ही होता है। ऐसे में अवकाश का दिन अलग-अलग तय होने से सड़कों पर ट्रैफिक का लोड और प्रदूषण का स्तर भी कम होगा। साथ ही, ऑफिस टाइमिंग में बदलाव की भी बड़ी जरूरत है। अधिकांश जगह सुबह 9 से शाम 5 बजे की शिफ्ट होती है।
3:-निजी वाहनों पर लगे कंजेशन शुल्क
लंदन, स्वीडन, सिंगापुर और मिलान जैसे शहरों में निजी वाहनों के इस्तेमाल पर कंजेशन शुल्क का प्रावधान है। देश के सबसे प्रदूषित शहरों में भी ऐसा ही नियम लागू किया जाना चाहिए। निजी वाहनों का प्रयोग महंगा होगा तो विकराल हो रही प्रदूषण की समस्या से निपटा जा सकेगा। पार्किंग के विवाद और जाम की समस्या पर भी अंकुश लगेगा।
4:-सार्वजनिक परिवहन को मिले बढ़ावा
जनसंख्या घनत्व के हिसाब से वर्ष 2031 तक में नोएडा की आबादी 25 लाख तक पहुंचने का आंकलन है। ऐसे में आबादी के बढ़ते बोझ की तरफ इशारा करते ये आंकड़े सक्षम सार्वजनिक जन यातायात व्यवस्था की फौरी जरूरत पर बल देते हैं। हालांकि, मेट्रो ने लोगों की राह आसान बनाई है, लेकिन मेट्रो तक पहुंचना आसान नहीं हो पाया है।