तड़के करीब सवा पांच बजे पड़ोसियों की आंख खुली तो बाहर से चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं। लोग बाहर निकले तो उनके रोंगटे खड़े हो गई। मकान नंबर-65 की पार्किंग में भयंकर आग लगी थी। आग की लपटों के बीच ग्राउंड फ्लोर पर बने फ्लैट से मदद की गुहार लगाई जा रही थी। राकेश और मनोज जान बचाने के लिए चिल्ला रहे थे।
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चार मंजिला इमारत में लगी भीषण आग
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कुछ ही देर बाद मदद की गुहार लगाती आवाजें धीरे-धीरे खामोश होती चली गईं। दरअसल राकेश और मनोज के फ्लैट के दरवाजे पर पार्किंग बनी हुई थी। आग लगी तो वहां से बाहर निकलने का रास्ता बंद हो गया। परिवार ने दरवाजा बंदकर बचने का प्रयास किया, लेकिन हीट और धुंए की वजह से उनका दम घुट गया।
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गीता कॉलोनी अग्निकांड
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पुलिस का कहना था कि दोनों मासूमों समेत चारों की मौत झुलसने से नहीं बल्कि दम घुटने से हुई। हीट की वजह से उनके शरीर हल्के काले पड़े हुए थे। इस फ्लैट में बचे बाकी तीन लोग राकेश, उसकी पत्नी बेबी और राकेश के छोटे भाई नंदू की हालत नाजुक बनी हुई है। परिजन उनके ठीक होने के लिए दुआएं कर रहे हैं।
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गीता कॉलोनी अग्निकांड
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हादसे में जान गंवाने वाले मनोज के साढ़ू वीरेश कुमार ने बताया कि मूलरूप से लेहरिया सराय, दरभंगा, बिहार के रहने वाले मनोज की दो माह पूर्व ही शास्त्री नगर निवासी समुन से शादी हुई थी। समुन का परिवार शास्त्री नगर में ही रहता है। करीब दो माह पूर्व मनोज और उसके बड़े भाई राकेश ने किराए का फ्लैट लिया था।
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गीता कॉलोनी अग्निकांड की पीड़िता
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तीनों भाई और उनका परिवार यहां रह रहा था। नंदू अविवाहित है। तीनों भाई घड़ौली डेयरी फॉर्म एरिया में बच्चों की साइकिल बनाने वाली एक फैक्टरी को चलाते थे। हादसे के समय राकेश, उसकी पत्नी बेबी, इनकी दो बेटियां सृष्टि, सुजाता और नंदू एक कमरे में थे। दूसरे कमरे में मनोज और सुमन मौजूद थे।