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हर साल बढ़ रहा राललीलाओं का क्रेज, अगर न होती ये 5 चीजें तो खत्म हो जाती ये कला

Fri, 22 Sep 2017 12:18 PM IST
Updated Fri, 22 Sep 2017 12:18 PM IST
सार

- यहां होते हैं ऐसे आकर्षण जो आमतौर पर देखने को नहीं मिलते
- साल में एक बार आता है ऐसा मौका बड़ों को याद करा देता है बचपन 
- युवाओं के लिए होता है खास इंतजाम
- आम आदमी तक पहुंचती है खास कलाएं

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five reason why craze for ramleela is increasing every year in delhi

कहते हैं जो वक्त के साथ नहीं बदलते वो खत्म हो जाते हैं। ये बात हर कला पर लागू होती है चाहे वो रामलीला ही क्यों न हो। क्या आपने कभी सोचा है कि क्यों दिल्ली जैसे अति आधुनिक शहर में वक्त बदलने के बावजूद रामलीला का क्रेज साल दर साल बढ़ता जा रहा है? पिछले 40 साल से दिल्ली के मंगोलपुरी में रामलीला कर रहे न्यू वक्त क्लब रामलीला कमेटी के उपाध्यक्ष राजेंद्र शौकीन इस ओर इशारा करते हुए बताते हैं, 'हम लोग पिछले 40 साल से रामलीला करा रहे हैं, लेकिन वक्त के साथ यहां आने वालों की तादात बढ़ती ही जा रही है।' असल में रामलीला मैदान की ओर हर साल बढ़ती भीड़ का राज इसी योजना में छुपा हुआ है। रामलीला के प्रति लोगों के बढ़ते क्रेज का कारण सिर्फ मंच पर होने वाले संवाद या भाव-भंगिमाएं ही नहीं हैं बल्कि, इसके पीछे कुछ ऐसी चीजें भी हैं जो अनायास ही लोगों को रामलीला मैदान की ओर खींच लाती हैं...

five reason why craze for ramleela is increasing every year in delhi

1. आकर्षक और रोमांचित कर देने वाले झूले: रामचंद्र शौकीन बताते हैं कि पहले लोगों के यहां आने का असल कारण ही रामलीला देखना होता था। कुछ छुट-पुट दुकानें भी लगती थीं। वक्त के साथ रामलीला मैदान के ज्यादातर हिस्से पर मनोरंजन के अन्य साधनों का कब्जा बढ़ने लगा। वो बताते हैं कि अब तो यहां आने वाली भीड़ का बड़ा हिस्सा असल में मेले में लगे आकर्षक झूलों का मजा लेने आता है और इस दौरान कुछ वक्त रामलीला को भी दे देता है।

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2. हर साल होता है कुछ नया: रामचंद्र शौकीन की बात तब सही लगने लगती है जब तमिलनाडू से आए जीए वेल्लू बताते हैं कि इस बार वो मंगोलपुरी रामलीला मैदान में दुनिया के सात अजूबों की प्रतिकृति बना रहे हैं जिसके लिए टिकट लगाया गया है। न्यू वक्त रामलीला कमेटी से जुड़े ओमप्रकाश चौटाला बताते हैं कि असल में रामलीला मैदान में आने वाली भीड़ के आकर्षण का सबसे बड़ा कारण मंच के ठीक सामने वाला हिस्सा है जहां हर साल देश या दुनिया की मशहूर इमारतों या मंदिरों की प्रतिकृति बनाई जाती है और लोग टिकट लेकर उसे देखने जाते हैं। इस बार यहां दुनिया के सात अजूबों की प्रतिकृति दिखाई जाएगी।

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3. तकनीक से बदली सोच: मंगोलपुरी से सटे सुल्तानपुरी के रामलीला मैदान में पिछले दस साल से फोटो कलर स्टूडियो का पंडाल लगाने वाले जितेंद्र बताते हैं कि कुछ सालों पहले जब मोबाइल कैमरा आया तो उनका धंधा ‌थोड़ा मंदा पड़ा लेकिन तत्काल फोटो की तकनीक ने इस चुनौती का मुंहतोड़ जवाब दिया। जितेंद्र बताते हैं कि दस मिनट में मनचाहा फोटो पाने की लालसा ने लोगों की भीड़ का रुख एकबार फिर से उनकी दुकान की ओर मोड़ दिया। वो बताते हैं कि यहां आने वाले युवा प्रेमी जोड़े और बच्चे ऐतिहासिक इमारतों और सुंदर वादियों वाली लोकेशन में फोटो खिंचवाने को लालयित र‌हते हैं जिसने उनका मुनाफा और धंधा दोनों बढ़ा है।

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4. आमलोगों के बीच आता है थियेटर: मंगोलपुरी रामलीला मैदान में सात अजूबों का दर्शन कर जैसे ही बाहर निकलते हैं तो अनुराधा थियेटर की जगमगाती लाइटें ध्यान खींच लेती हैं। असल में इन थियेटर में देश-दुनिया के मशहूर नाटकों का मंचन आम लोगों की भाषा में किया जाता है। इसमें लैला-मजनू, शिरी फरहाद, राजा हरिश्चंद्र और सुल्ताना डाकू सबसे लोकप्रिय हैं। इन कहानियों की आम लोगों तक पहुंच इन मेलों में लगने वाले ‌‌थियेटर में ही हो पाती है। हालांकि अनुराधा थियेटर के प्रोपराइटर मोहम्मद असलम बताते हैं कि अब इसके प्रति लोगों का रुझान कम होता जा रहा है इसलिए बीच-बीच में फिल्मी गाने, आइटम डांस या कॉमेडी का तड़का लगाना पड़ता है ताकि दर्शक बोर न हो जाएं।

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