दिल्ली को चलानेवाले लोगों के बीच मतभेद इतना बढ़ गया है कि सुप्रीम कोर्ट को ताक़ीद करनी पड़ी कि 'अब वो हर हालत में सुलह करें' और 'दिल्ली की खराब हालत की सफ़ाई के लिए एक-दूसरे पर इलज़ाम लगाने का सहारा ना लें।'
पहली बार नहीं हुई तनातनी, 1952 से होती रही है केंद्र और दिल्ली के बीच जंग
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ये पहली बार नहीं है कि दिल्ली के उप-राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच तनातनी हुई हो। शुरुआत तो शुरुआत में ही हो गई थी। 1952 में जब दिल्ली के पहले चुनाव हुए तो कांग्रेस नेता चौधरी ब्रह्म प्रकाश दिल्ली के पहले मुख़्यमंत्री बने।
तब दिल्ली के मुखिया चीफ़ कमिश्नर होते थे जो मुख़्यमंत्री और मंत्रियों के सुझावों पर फ़ैसले लेते थे। तत्कालीन चीफ़ कमिश्नर आनंद डी पंडित को तब गृह मंत्री रहे गोविंद वल्लभ पंत का विश्वास हासिल था।
जब पंडित और चौधरी ब्रह्म प्रकाश के बीच दिल्ली को चलाने को लेकर असहमति बढ़ती गई तो आख़िरकार मुख़्यमंत्री को 1955 में इस्तीफ़ा देना पड़ा। और 1956 में दिल्ली से राज्य का दर्जा ही ले लिया गया।
फिर 1989 में दिल्ली को सभी केंद्र शासित राज्यों में एक विशेष दर्जा दिया गया जिसके तहत इसे फिर एक मुख़्यमंत्री मिलना था। इस नई व्यवस्था में दिल्ली के पहले चुनाव 1993 में हुए लेकिन इस दरम्यान ज़मीन, क़ानून व्यवस्था और 'सर्विसिस' यानि सेवाएं जैसी ज़िम्मेदारियां दिल्ली सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर ही रहीं।
अरविंद मोहन मिश्र कहते हैं कि दिल्ली को पूरे राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग इसके बाद भी लगातार बनी रही है क्योंकि मुख़्यमंत्री-उप-राज्यपाल के विवाद ख़त्म नहीं हुए।
1993 में भारतीय जनता पार्टी की जीत हुई. लेकिन 1984 के सिख़ दंगों की जांच के आदेश देने के बाद मुख़्यमंत्री मदन लाल ख़ुराना और उप-राज्यपाल पीके दवे के बीच तनातनी हो गई।
पीके दवे ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि क़ानून व्यवस्था से जुड़े किसी मुद्दे पर समिति बैठाने का मुख़्यमंत्री को कोई हक़ नहीं।
मिश्र कहते हैं, "दंगे की जांच एक राजनीतिक फ़ैसला था लेकिन कहीं ना कहीं राज्य की सत्ता से जुड़ा भी था और यहीं फ़र्क तब और अब में है, पहले ऐसे टकराव से थोड़ा राजनीतिक दिखावा कर प्रशासनिक स्तर पर उसका निपटारा हो जाता था अब ये अमर्यादित लड़ाई का रूप ले चुका है।"
मदनलाल खुराना के बाद भारतीय जनता पार्टी के साहिब सिंह वर्मा और कांग्रेस की शीला दीक्षित के मुख़्यमंत्री कार्यकाल में भी उप-राज्यपाल के साथ तनातनी बनी रही।
इसी वजह से 1998 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी कर ये साफ़ किया कि उप-राज्यपाल को हर मामले में मुख़्यमंत्री से 'विमर्श' करना होगा फिर चाहे वो राष्ट्रपति के प्रतिनिधि होने के नाते उनके अधिकारक्षेत्र के मसले ही क्यों ना हों।
लेकिन मई 2015 में मोदी सरकार ने एक और अधिसूचना जारी की जिसके तहत अब ये उप-राज्यपाल की मर्ज़ी है कि वो 'अधिकारियों की नियुक्ति और ट्रांस्फ़र' जैसे 'सर्विसिस' से जुड़े मुद्दों पर मुख़्यमंत्री की 'राय' ले या नहीं।
अरविंद मोहन मिश्र के मुताबिक संविधान में दिल्ली के मुख़्यमंत्री और उप-राज्यपाल के अधिकारक्षेत्र काफ़ी साफ़ तरीके से तय हैं, दिक्कत ये कि अब से पहले हुए टकराव काम करने की मंशा से होते थे जो अब जनता के हित से इतर इन दोनों धड़ों के बीच की लड़ाई बनकर रह गए हैं।