नोटबंदी से नेपाल सीमा पर बनबसा के फागपुर गांव की अर्थव्यवस्था पूर्व सैनिकों और सेना की छावनी के ईद-गिर्द घूमने को विवश है। इस अंबेडकर गांव में निर्धन और दलित वर्ग का जीवन तो जैसे थम सा गया है। यहां भुखमरी जैसे हालात हैं।
नोट बंदी से उत्तराखंड के इस गांव में हुए भुखमरी जैसे हालात
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नोटबंदी से मजदूर वर्ग बेरोजगार हो गया है। दिहाड़ी पर काम करने वालों को उधार पर जीवन यापन करने को विवश होना पड़ रहा है। बार्टर सिस्टम (सामान के बदले सामान) पर दो वक्त की रोटी मिल रही है। सब्जी उत्पादक ओमप्रकाश के मुताबिक दुकान पर सब्जी देकर बदले में दैनिक उपभोग की वस्तुएं ले रहे हैं।
आखिर कब तक चलेगा उधार पर कारोबार? यह कहना है अंबेडकर ग्राम फागपुर निवासी नारायण राम का। छोटी सी दुकान चलाने वाले नारायण कहते हैं कि नोटबंदी ने कारोबार ठप कर दिया है। पास में पैसे न होने से व्यापारियों ने भी सामान देना बंद कर दिया है। कहते हैं कि जल्द स्थिति नहीं सुधरी तो दुकान बंद करने को विवश होना पड़ेगा।
नोटबंदी ने तो फागपुर नई बस्ती निवासी रमेश राम के परिवार के आगे भुखमरी पैदा कर दी है। हरियाणा में किसी मेस में कुक का काम करने वाले रमेश ने बताया कि नोटबंदी के चलते मालिक को मेस बंद करनी पड़ी। बताया कि यहां भी नोटबंदी के चलते काम नहीं मिल पा रहा है। इसी बीच बेटा बीमार पड़ा तो पैसे की तंगी से इलाज में दिक्कतें आईं। उधार में भी मिला तो एक हजार का नोट जिसे हर किसी ने लेने से मना कर दिया। बनबसा के एक डॉक्टर से उधार में बेटे का उपचार कराया।
अंबेडकर ग्राम फागपुर में छोटी सी दुकान, साइकिल मरम्मत के साथ कुटीर उद्योग के तहत मोमबत्ती बनाने वाले दिलीप सिंह रावत का कहना है कि दुकान और साइकिल मरम्मत पर असर नहीं पड़ा है। प्रतिदिन हजार-बारह सौ की बिक्री होती थी जो बदस्तूर जारी है, लेकिन उनका मोमबत्ती बनाने का काम ठप सा हो गया है। कच्चा माल लेने में परेशानी पैदा होने के साथ ही व्यापारियों ने माल लेना बंद कर दिया है।