करीब 6 साल की कानूनी लड़ाई और पुत्र के रूप में हक मिलने के बाद चार साल लगातार बीमार पिता की 24 घंटे सेवा, और पिता के जाने के बाद छह माह के भीतर ही निधन। यह कहानी है उस रोहित शेखर तिवारी की जिसने बचपन के साथ-साथ अपनी पूरी जवानी भी पिता का साया पाने के इंतजार में पल-पल कर काट दी। जब जीवन के 34 बसंत देखने के बाद पिता ने अपना लिया तो वो उन्हें खुले दिल से माफ कर अपना दर्द भूल गया।
लंबी लड़ाई से हक पाकर पुत्रधर्म निभा गए रोहित, पिता एनडी को वाजपेयी-मुखर्जी से ऊपर मानते थे ‘गुंजनू’
रोहित शेखर तिवारी को पिता एनडी तिवारी प्यार से गुंजनू बुलाते थे। वो कहते थे कि ‘मेरे पिता से जुड़ीं कंट्रोवर्सी नहीं, उनके द्वारा किए विकास कार्यों को देखें। मेरे पिता ने 65 साल तक देश की सेवा की है, मुझे कहने में कोई हिचक नहीं कि इस मामले में वे अटल बिहारी वाजपेयी और प्रणव मुखर्जी से भी कहीं आगे हैं।’
करीब तीन साल बाद सितंबर 2017 जब एनडी को ब्रेन स्टोक पड़ा तो दिल्ली के मैक्स अस्पताल में उन्हें भर्ती करा दिया गया। इसके बाद तो जैसे मैक्स अस्पताल ही रोहित का दूसरा घर हो गया। उन्होंने दिन-रात 24 घंटे यहां रहकर पिता की सेवा करनी शुरू कर दी। सुबह-शाम एनडी को दवा खिलाना, डॉक्टरों से हालचाल जानना, मिलने-जुलने आने वालों को रिसीव करना और मीडिया को एनडी की कुशलक्षेम बताना ही रोहित की दिनचर्या हो गई।