पूर्व राष्ट्रपति स्व. प्रणब मुखर्जी को याद कर उत्तराखंड के लोग शोकाकुल हैं। उत्तराखंड के लोग राज्य में राष्ट्रपति शासन लगने और पहली बार राष्ट्रपति के अधिकार को लेकर उत्तराखंड उच्च न्यायालय की टिप्पणी को शायद ही कभी भुला सकें। इसमें कोर्ट ने माना था कि राष्ट्रपति का आदेश न्यायिक समीक्षा से परे नहीं हो सकता। कोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य में ऐसे प्रकरण के लिए एक मिसाल बन चुकी है। यह संयोग है कि उस दौर में प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति थे। हालांकि टिप्पणी केवल राष्ट्रपति के अधिकारों को लेकर ही थी।
उत्तराखंड में 18 मार्च 2016 को तत्कालीन कांग्रेस सरकार के शासन के दौरान कांग्रेस के 36 में से नौ विधायकों ने बगावत कर दी थी और बाद में सरकार को अल्पमत में बता कर निलंबित करने की मांग को लेकर विधानसभा की वेल में ही धरने पर बैठ गए थे। 20 मार्च को तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने इन विधायकों को निलंबित कर दिया था। जिस पर विधायकों ने सरकार को अल्पमत में बता विधानसभा अध्यक्ष के इस निर्णय को उनके अधिकार से बाहर बताया।
21 मार्च को कांग्रेस के बागी विधायक भाजपा के विधायकों के साथ राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मिले और प्रदेश में राष्ट्रपति शासन की मांग की थी। इन विधायकों के भाजपा के साथ मिलकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल देने और केंद्रीय कैबिनेट की 26 मार्च की सिफारिश के बाद 27 मार्च 2016 को राज्य में प्रणब मुखर्जी के हस्ताक्षर से पहली बार राष्ट्रपति शासन लगा था। माना जाता है कि प्रणब मुखर्जी कैबिनेट के निर्णय पर पुन: विचार करने की सलाह देना चाहते थे, लेकिन भाजपा आलाकमान की पहल पर अरुण जेटली की उनसे वार्ता और सांविधानिक व्यवस्थाओं के तहत उन्होंने कैबिनेट की सिफारिश पर बगैर विवाद में पड़े हस्ताक्षर कर दिए थे।
उत्तराखंड में तब उसी कांग्रेस पार्टी की सरकार थी जिसमें उन्होंने अपने जीवन के चालीस वर्ष बिताए थे। वे पार्टी की ओर से महत्वपूर्ण दायित्व संभाल चुके थे। यह एक दिलचस्प उदाहरण था कि उनके हस्ताक्षर से जारी राष्ट्रपति शासन को कांग्रेस पार्टी की ओर से ही हाईकोर्ट में चुनौती दी गई और दशकों तक उन्हीं के अत्यंत करीबी सहयोगी रहे कपिल सिब्बल सहित अन्य अधिवक्ताओं ने उनके आदेश को संविधान की हत्या करने वाला कहकर कोर्ट में इसकी जबरदस्त खिलाफत की। 28 मार्च को हरीश रावत ने कोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी जिस पर कोर्ट ने उन्हें 31 मार्च को फ्लोर टेस्ट के निर्देश दिए जबकि 30 मार्च को चुनौती देने पर डबल बेंच ने इसे स्थगित कर दिया था।
बाद में केंद्र की ओर से इस निर्णय को इसी बहस के दौरान केंद्र सरकार की ओर से इसे राष्ट्रपति का अधिकार बताए जाने पर 20 अप्रैल को हाईकोर्ट की वह ऐतिहासिक टिप्पणी सामने आई। इसमें कोर्ट ने कहा था कि राष्ट्रपति का पद देश का सर्वोच्च सम्माननीय होने के बावजूद राष्ट्रपति कोई राजा नहीं और उनके अधिकार असीमित अथवा न्यायिक समीक्षा से परे नहीं हैं। लंबी सुनवाई के बाद 22 अप्रैल को कोर्ट ने उनके इस आदेश को खारिज कर दिया था और हरीश रावत सरकार फिर से बहाल हो गई थी।