केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई) रुड़की की ओर से अयोध्या में बनाए जा रहे श्रीराम मंदिर के भवन का डिजाइन ऐसी खास कला और तकनीक के इस्तेमाल से तैयार किया गया है, जिससे कम से एक हजार साल तक इसका बाल भी बांका नहीं हो सकेगा। पूरे भवन की प्रतिपल हेल्थ मॉनिटरिंग के लिए नींव, कॉलम और रिटेनिंग वॉल में सेंसर लगाए गए हैं। मंदिर के विशालकाय भवन की खासियत यह भी है कि इसमें कहीं भी सरिया नहीं लगा है।
Ram Mandir: 1000 साल तक रामलला के घर का नहीं होगा बाल भी बांका, भवन का भार उठाएंगे हाथी-घोड़े, जानें खास बातें
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भवन के भार संतुलन के लिए स्थापित किए गए हैं हाथी और घोड़े
मंदिर का भवन कलाकृति का भी बेजोड़ नमूना होगा। पूरे भवन में भार को संतुलित करने के लिए जगह-जगह भारी भरकम हाथी और घोड़े स्थापित किए गए हैं। वैज्ञानिक डॉ. देवदत्त घोष ने बताया कि भवन पूरी तरह भूकंपरोधी है। साथ ही इसे किसी भी प्राकृतिक आपदा की आशंका से दोगुनी क्षमता सहने के हिसाब से तैयार किया गया है।
120 मीटर गहराई तक लिए गए मिट्टी के सैंपल
वैज्ञानिक डाॅ. मनोजीत सामंता ने बताया कि पूरे भवन में रियल टाइम मॉनिटरिंग सेंसर लगाए गए हैं जो हर पल भवन की सेहत और उसमें बदलाव की जानकारी देंगे। कहा कि श्रीराम मंदिर की बुनियाद बेहद मजबूत है। 60 मीटर से लेकर 120 तक गड्ढा करने के बाद पक्की मिट्टी के सैंपल की जांच के बाद डेढ़ मीटर मोटा स्ट्रक्चरल डिजाइन तैयार किया गया है।
सूर्यदेव लगाएंगे माथे पर तिलक, सीबीआरआई ने लगाए शीशे
प्रोजेक्ट सूर्य तिलक को भी सीबीआरआई ने अंजाम दिया है। इसके तहत मंदिर के भीतर विराजमान रामलला के मस्तक पर रामनवमी के दिन सूर्य की किरणें दोपहर 12 बजकर 04 मिनट पर 20 सेकेंड के लिए विराजमान रहेंगी। वैज्ञानिक डाॅ. एसके पाणिग्रही ने बताया कि मंदिर के ऊपर की मंजिल पर शीशा लगा है और इसी तरह फाउंडेशन में लगा है। ये सामने से आने वाली सूर्य की किरणों को बुनियाद के शीशे पर रिफलेक्ट करेगा और यहां से सूर्य की किरणें रामलला के मस्तक पर पड़ेंगी। इसके लिए गियर मैकेनिज्म का प्रयोग किया गया है। इसके जरिए रामनवमी को शीशे की दिशा को खास तरीके से फिक्स किया जाएगा।
जिस टेंट में विराजे थे रामलला, उसे भी संस्थान ने बनाया था
सीबीआरआई रुड़की तीन दशक से अयोध्या में विराजमान रामलला की सेवा में तकनीकी सहायता उपलब्ध कराता रहा है। वैज्ञानिक डॉ. हरपाल सिंह ने बताया कि विराजमान लला के ऊपर के तिरपाल को आग और पानी व बंदरों से सुरक्षित रखने के लिए संस्थान में बनाया गया। 400 वर्ग मीटर के तिरपाल पर विशेष प्रकार के केमिकल की कोटिंग कर 1994 में रामलाला के ऊपर स्थापित किया गया। इसके बाद 2003 और फिर 2015 में नया तिरपाल बनाकर भेजा गया।