संतान की रक्षा एवं दीर्घायु के लिए कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अहोई व्रत गुरुवार(12 अक्टूबर) को किया जाएगा। इस बार माताओं को शाम के पूजन का शुभ समय 1 घंटा 5 मिनट ही मिलेगा। इस मुहूर्त में पूजा करेंगे तो अधिक फलदायी होगा।
यह व्रत उदय कालिक एवं प्रदोष व्यापिनी अष्टमी तिथि में करना चाहिए। इस व्रत पर पूजन का शुभ मुहूर्त शाम 5.50 मिनट से 6.55 मिनट तक यानी 1 घंटा 5 मिनट तक रहेगा। सूर्यास्त के बाद ही अहोई पूजा की जाती है। 12 अक्तूबर को यह तिथि प्रात: 6.46 मिनट पर लगेगी जो कि 13 को प्रात: 5.02 मिनट तक रहेगी।
उत्तराखंड विद्वत सभा के पूर्व उपाध्यक्ष आचार्य भरत राम तिवारी के अनुसार अहोई व्रत में चांदी की माला में दो चांदी के दाने पुत्र के जन्म एवं विवाह के समय डालकर स्त्रियां धारण करती हैं। तारों के उदय होने पर अहोई माता (लक्ष्मी-पार्वती) की पूजा की जाती है। सात दाने गेहूं के हाथ में लेकर कथा सुनी जाती है।
बायना निकालकर सास, ननद या जेठानी को दिया जाता है। डा. आचार्य सुशांत राज के अनुसार संतान के कल्याण एवं दीर्घायु के लिए यह व्रत किया जाता है। अहोई माता की माला को दीवाली तक गले में पहनना होता है। यह व्रत निर्जला रखा जाता है। इस दिन महिलाएं तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं।
कलश की पूजा के बाद दीवार पर बनाई गई अहोई और स्याऊ माता की पूजा कर उन्हें दूध और भात का भोग लगाएं। शाम के समय चंद्रमा को अर्घ्य देकर कच्चा भोजन किया जाता है। इस व्रत में कथा सुनने का भी विधान है। पूजा के दौरान करवा पर रखे साड़ी-शगुन के पैसे और भोजन आदि घर में सास या परिवार की सौभाग्यवती महिलाओं को दिया जाता है।