आज के इस भागम-भाग दौर में एक बीमारी बड़ी चुनौती बन गई है। इस बीमारी की चपेट में आकर कई बार आपके अपने आपसे बहुत दूर हो जाते हैं।
ये बीमारी है डिप्रेशन। अगर इस बीमारी का समय पर इलाज न किया जाए, तो मरीज आत्महत्या करने का फैसला तक ले सकता है।
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डिप्रेशन
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सकारात्मक सोच और नियमबद्ध जीवन ही इस बीमारी से लड़ने की ताकत देता है। पटियाला के सरकारी राजिंदरा अस्पताल के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के प्रमुख डा. अमरजीत सिंह का मानना है कि आज पूरे देश में 10 फीसदी लोग डिप्रेशन की बीमारी से ग्रस्त हैं। इनमें से बहुत से रोगी तो इस बीमारी को मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं।
डिप्रेशन एक आम लफ्ज और हमारी जिन्दगी का एक अहम हिस्सा बन गया है. अहम हिस्सा ही तो है. जो किसी के घर में ही घर बना ले, वो उस घर का अहम हिस्सा बन जाता है. और जो हर जिन्दगी में जगह बना ले वो? डिप्रेशन कॉमन कोल्ड जैसी ही कॉमन बिमारी हो गई है. कुछ लोग इसे अमीरों की बिमारी कहते हैं. पर यह उन लोगों की गलतफहमी है. डिप्रेशन कोई अमीरों वाली बिमारी नहीं है, कोई भी इंसान इससे पीड़ित हो सकता है.
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मान लीजिए आप एक अंधेरे कमरे में हैं. कमरे में इतना ज्यादा अंधेरा है कि आपको खुद अपना शरीर भी महसूस न हो रहा हो. घुप्प अंधेरे में डूबा हुआ कमरा और आप बिल्कुल अकेली हैं. आप कैसा महसूस करेंगी? डिप्रेशन में कुछ ऐसा ही होता है. भीड़ में तन्हाई का एहसास होता है और तेज रौशनी में भी घने काले अंधेरे का। डिप्रेशन इतना ज्यादा खतरनाक होता है जिसमें कई बार इंसान खुदकुशी जैसा कदम उठा लेता है।