अपने अदम्य साहस, असाधारण दृढ़ता और अनुकरणीय पेशेवर हुनर के दम पर 1965 की जंग में पाकिस्तान को धूल चटाने वाले अर्जन सिंह नहीं रहे। इस तस्वीर से समझिए कि वह एक योद्धा के साथ कैसे इंसान थे...
वायुसेना के मार्शल अर्जन सिंह 98 वर्ष के थे। उन्होंने दिल्ली में सेना के आरआर अस्पताल में शाम 7:47 बजे अंतिम सांस ली। शनिवार सुबह दिल का दौरा पड़ने के बाद उन्हें यहां भर्ती कराया गया था। रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि मार्शल अर्जन सिंह के निधन से भारतीय वायुसेना का एक गौरवशाली युग का अंत हो गया।
देश के सैन्य इतिहास में मार्शल अर्जन सिंह उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे, जिसने पर्याप्त और उत्कृष्ट सैन्य साजो-सामान के बिना देश के लिए मर-मिटने की प्रबल भावना से हर मुश्किल मोर्चे को फतह किया था। सैन्य परिवार में जन्मे अर्जन सिंह भारतीय वायुसेना के एकमात्र अफसर थे, जिन्हें फाइव स्टार रैंक के साथ मार्शल (सेना में फील्ड मार्शल के बराबर) का ओहदा दिया गया था। तीनों सेनाओं में फाइव स्टार रैंक के अधिकारी कभी रिटायर नहीं होते।
वायुसेना के सबसे युवा चीफ थे मार्शल अर्जन सिंह
भारतीय सेना के लिए मिसाल माने जाने वाले अर्जन सिंह ने 1965 में सबसे युवा वायु सेना प्रमुख के रूप में जिम्मेदारी संभाली थी। उस समय उनकी आयु महज 45 वर्ष थी। अर्जन सिंह के अंदर लड़ाकू पायलट का जज्बा आखिरी तक बरकरार रहा। 1969 में रिटायरमेंट तक वह सेना के 60 तरह के विमान उड़ा चुके थे।
1965 में मार्शल अर्जन सिंह को देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से नवाजा गया था। 2016 में पश्चिम बंगाल के पानागढ़ एयरबेस का नाम अर्जन सिंह एयरबेस कर दिया गया था। वह पहले जीवित सेनानायक थे, जिनके नाम पर किसी एयरबेस का नाम रखा गया है।