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ये हैं असल जिंदगी के 4 'सेंटा क्लॉज', एक ने 'उड़ाई' करोड़ों की कमाई, पर किसी को भूखा सोने नहीं दिया
Tue, 25 Dec 2018 01:59 PM IST
खुशबू गोयल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Tue, 25 Dec 2018 01:59 PM IST
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क्रिसमस के मौके पर हम आपको मिला रहे हैं असल जिंदगी के कुछ 'सेंटा क्लॉज' से, जिनमें से एक ने तो जीवन भर की कमाई लगा दी, पर किसी को भूखा सोने नहीं दिया। दुखी और जरूरतमंद लोगों के चेहरों पर मुस्कान बिखेरना 'सेंटा क्लॉज' का असल मकसद है। इस सोच और विचारधारा के कुछ लोग चंडीगढ़ में भी हैं, जो नि:स्वार्थ भाव से जरूरतमंद, वचिंत और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की सेवा में वर्षों से जुटे हुए हैं। इनमें से किसी ने अपना पूरा जीवन लगा दिया तो किसी ने भूखों का पेट भरने के लिए अपनी प्रॉपर्टी तक बेच दी। जानिए कौन हैं ये, और क्या करते हैं...
जगदीश लाल आहूजा लंगर
17 सालों से गरीबों का पेट भर रहे हैं लंगर वाले बाबा
सेक्टर-23 में रहने वाले जगदीश लाल आहुजा ने पीजीआई में लंगर शुरू किया और उनकी देखादेखी अन्य लोगों ने अस्पतालों के बाहर लंगर लगाना शुरू कर दिया। जगदीश लाल 17 सालों से बिना किसी स्वार्थ के पीजीआई के बाहर लंगर लगा रहे हैं। चाहे चिलचिलाती धूप हो या कड़ाके की सर्दी। इन 17 सालों में एक भी दिन ऐसा नहीं बीता, जब उन्होंने पीजीआई के बाहर लंगर न लगाया हो। लंगर को सुचारु रूप से चलाने के लिए उन्हें अपनी कई प्रॉपर्टी तक बेचनी पड़ीं। कई मुसीबतें भी सामने आईं, लेकिन उन्होंने लंगर चलाना नहीं छोड़ा। पीजीआई के अतिरिक्त वे मेडिकल कॉलेज के बाहर भी लंगर लगाते हैं। इसके अलावा गरीब बच्चों और जरूरतमंदों को सामान देते हैं। गरीब बच्चों की फीस भी भरते हैं। उनके लंगर से रोजाना 100 से ज्यादा लोग पेट भरते हैं। पूरा शहर उन्हें लंगर वाले बाबा के नाम से जानता है। जगदीश लाल की उम्र 83 साल की है, लेकिन वह आज भी लंगर पर जरूर पहुंचते हैं। बताया जाता है कि जब वह चंडीगढ़ आए थे तो उन्होंने केले बेचकर अपना जीवन शुरू किया था। वह कई बार एलान कर चुके हैं कि जब तक वह जिंदा, तब तक लंगर बंद नहीं होगा।
सेक्टर-23 में रहने वाले जगदीश लाल आहुजा ने पीजीआई में लंगर शुरू किया और उनकी देखादेखी अन्य लोगों ने अस्पतालों के बाहर लंगर लगाना शुरू कर दिया। जगदीश लाल 17 सालों से बिना किसी स्वार्थ के पीजीआई के बाहर लंगर लगा रहे हैं। चाहे चिलचिलाती धूप हो या कड़ाके की सर्दी। इन 17 सालों में एक भी दिन ऐसा नहीं बीता, जब उन्होंने पीजीआई के बाहर लंगर न लगाया हो। लंगर को सुचारु रूप से चलाने के लिए उन्हें अपनी कई प्रॉपर्टी तक बेचनी पड़ीं। कई मुसीबतें भी सामने आईं, लेकिन उन्होंने लंगर चलाना नहीं छोड़ा। पीजीआई के अतिरिक्त वे मेडिकल कॉलेज के बाहर भी लंगर लगाते हैं। इसके अलावा गरीब बच्चों और जरूरतमंदों को सामान देते हैं। गरीब बच्चों की फीस भी भरते हैं। उनके लंगर से रोजाना 100 से ज्यादा लोग पेट भरते हैं। पूरा शहर उन्हें लंगर वाले बाबा के नाम से जानता है। जगदीश लाल की उम्र 83 साल की है, लेकिन वह आज भी लंगर पर जरूर पहुंचते हैं। बताया जाता है कि जब वह चंडीगढ़ आए थे तो उन्होंने केले बेचकर अपना जीवन शुरू किया था। वह कई बार एलान कर चुके हैं कि जब तक वह जिंदा, तब तक लंगर बंद नहीं होगा।
हरभजन कौर
मरीजों के इलाज में लगा दी पूरी पेंशन
सेक्टर 46 में रहने वालीं हरभजन कौर असहाय और गरीब मरीजों की मदद के लिए पूरी तरह से समर्पित हैं। पंजाब मार्कफेड से रिटायरमेंट के बाद हरभजन कौर को जो भी पेंशन मिली, उसे उन्होंने पीजीआई को दान कर दिया। अब तक वह पीजीआई को 22 लाख रुपये दान में दे चुकी हैं। उनसे प्रभावित होकर उनके बेटे ने भी कुछ दिन पहले पीजीआई को पांच लाख रुपये का दान दिया है। यही नहीं, उनके दोहते उपनिंदरजीत सिंह भी उनकी राह पर चल पड़े हैं और अपनी पहली तनख्वाह मिलने पर 50 हजार रुपये पीजीआई को दान कर दिए। हरभजन कौर कहती हैं कि जब उन्हें पीजीआई से फोन आता है तो वह मदद के लिए दौड़ पड़ती हैं। मदद करने का जुनून उन्हें अपने दादा से मिला है। मरीजों की मदद करने के अलावा वह उन बच्चों की पढ़ाई जारी करने में भी अहम भूमिका निभाती हैं, जिनकी पढ़ाई रुपयों के अभाव में बीच में ही छूट जाती है। ऐसे करीब 22-23 बच्चे होंगे, जिनकी हायर स्टडीज में वह सहयोग कर रही हैं।
सेक्टर 46 में रहने वालीं हरभजन कौर असहाय और गरीब मरीजों की मदद के लिए पूरी तरह से समर्पित हैं। पंजाब मार्कफेड से रिटायरमेंट के बाद हरभजन कौर को जो भी पेंशन मिली, उसे उन्होंने पीजीआई को दान कर दिया। अब तक वह पीजीआई को 22 लाख रुपये दान में दे चुकी हैं। उनसे प्रभावित होकर उनके बेटे ने भी कुछ दिन पहले पीजीआई को पांच लाख रुपये का दान दिया है। यही नहीं, उनके दोहते उपनिंदरजीत सिंह भी उनकी राह पर चल पड़े हैं और अपनी पहली तनख्वाह मिलने पर 50 हजार रुपये पीजीआई को दान कर दिए। हरभजन कौर कहती हैं कि जब उन्हें पीजीआई से फोन आता है तो वह मदद के लिए दौड़ पड़ती हैं। मदद करने का जुनून उन्हें अपने दादा से मिला है। मरीजों की मदद करने के अलावा वह उन बच्चों की पढ़ाई जारी करने में भी अहम भूमिका निभाती हैं, जिनकी पढ़ाई रुपयों के अभाव में बीच में ही छूट जाती है। ऐसे करीब 22-23 बच्चे होंगे, जिनकी हायर स्टडीज में वह सहयोग कर रही हैं।
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एडवोकेट एचसी अरोड़ा
बैंक की नौकरी छोड़ तेजाब पीड़ितों की कर रहे मदद
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट एचसी अरोड़ा एसिड अटैक पीड़िताओं के लिए किसी सेंटा क्लॉज से कम नहीं। 2012 से उन्होंने एसिड अटैक पीड़ितों के लिए लड़ाई शुरू की थी। उनकी जनहित याचिका की सुनवाई पर हरियाणा-पंजाब और चंडीगढ़ ने पीड़ितों के लिए पालिसी बनाई और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए आठ हजार रुपये सहायता देने का प्रावधान भी किया। 40 प्रतिशत से अधिक दिव्यांगता पर नौकरी के लिए आवेदन करने के लिया योग्य करार दिया गया। यही नहीं, यदि एसिड अटैक का कोई आरोपी बरी होता है तो उसके खिलाफ अपील तथा यदि कोई जमानत मांगने हाईकोर्ट आता है उसके खिलाफ केस लड़ने के लिए भी अरोड़ा किसी तरह की कोई फीस नहीं लेते हैं। वे एसिड अटैक पीड़िता की आर्थिक मदद भी करते हैं। अक्सर इन पीड़ितों के पास आने-जाने का खर्च तक नहीं होता है। ऐसी स्थिति को देखते हुए अरोड़ा उन्हें आने-जाने के खर्च के साथ ही अपने सामर्थ्य के अनुसार आर्थिक सहायता भी उपलब्ध करवाते हैं। इसके साथ ही गरीब लड़कियों की शादि के लिए भी वे 5500 रुपये की राशि उपलब्ध करवाते हैं। उनकी पत्नी इंदु इस कार्य में सबसे आगे रहती हैं। अरोड़ा बैंक में अच्छे पोस्ट पर तैनात थे। नौकरी से त्यागपत्र देकर उन्होंने वकालत शुरू कर दी।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट एचसी अरोड़ा एसिड अटैक पीड़िताओं के लिए किसी सेंटा क्लॉज से कम नहीं। 2012 से उन्होंने एसिड अटैक पीड़ितों के लिए लड़ाई शुरू की थी। उनकी जनहित याचिका की सुनवाई पर हरियाणा-पंजाब और चंडीगढ़ ने पीड़ितों के लिए पालिसी बनाई और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए आठ हजार रुपये सहायता देने का प्रावधान भी किया। 40 प्रतिशत से अधिक दिव्यांगता पर नौकरी के लिए आवेदन करने के लिया योग्य करार दिया गया। यही नहीं, यदि एसिड अटैक का कोई आरोपी बरी होता है तो उसके खिलाफ अपील तथा यदि कोई जमानत मांगने हाईकोर्ट आता है उसके खिलाफ केस लड़ने के लिए भी अरोड़ा किसी तरह की कोई फीस नहीं लेते हैं। वे एसिड अटैक पीड़िता की आर्थिक मदद भी करते हैं। अक्सर इन पीड़ितों के पास आने-जाने का खर्च तक नहीं होता है। ऐसी स्थिति को देखते हुए अरोड़ा उन्हें आने-जाने के खर्च के साथ ही अपने सामर्थ्य के अनुसार आर्थिक सहायता भी उपलब्ध करवाते हैं। इसके साथ ही गरीब लड़कियों की शादि के लिए भी वे 5500 रुपये की राशि उपलब्ध करवाते हैं। उनकी पत्नी इंदु इस कार्य में सबसे आगे रहती हैं। अरोड़ा बैंक में अच्छे पोस्ट पर तैनात थे। नौकरी से त्यागपत्र देकर उन्होंने वकालत शुरू कर दी।
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गौरव गौड़
एचआईवी पीड़ित विधवाओं और बच्चों का सुधार रहे जीवन
पंजाब यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर सोशल वर्क विभाग में असिस्टेंट पद पर कार्यरत डॉ. गौरव गौड़ पिछले कई सालों से एचआईवी पीड़ितों का जीवन स्तर सुधारने के लिए काम कर रहे हैं। वह पीड़ित विधवाओं को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए हर रक्षा बंधन पर उनसे राखी बंधवाते हैं। उनके बच्चों की मदद के लिए वह हर साल स्टेशनरी देते हैं। यदि किसी बच्चे को स्कूल बैग की जरूरत होती है तो वे मुहैया करवाते हैं। यदि किसी बच्चों की फीस भरनी हो तो वे इसके लिए भी तैयार रहते हैं। करीब 38-40 बच्चे हैं, जिनका वह पूरा ख्याल रखते हैं। उनका कहना है कि वे जब नेहरू युवा केंद्र से जुड़े थे, तभी उनकी इच्छा थी कि वे हेल्थ के क्षेत्र में कोई कार्य करें। इसके लिए उन्होंने एचआईवी पीड़िताओं को चुना और उनके लिए काम करना शुरू किया। इसके अतिरिक्त वे स्कूल कॉलेज में एचआईवी के लिए अवेयरनेस प्रोग्राम चलाते हैं। लोगों और बच्चों को जागरूक करते हैं।
पंजाब यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर सोशल वर्क विभाग में असिस्टेंट पद पर कार्यरत डॉ. गौरव गौड़ पिछले कई सालों से एचआईवी पीड़ितों का जीवन स्तर सुधारने के लिए काम कर रहे हैं। वह पीड़ित विधवाओं को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए हर रक्षा बंधन पर उनसे राखी बंधवाते हैं। उनके बच्चों की मदद के लिए वह हर साल स्टेशनरी देते हैं। यदि किसी बच्चे को स्कूल बैग की जरूरत होती है तो वे मुहैया करवाते हैं। यदि किसी बच्चों की फीस भरनी हो तो वे इसके लिए भी तैयार रहते हैं। करीब 38-40 बच्चे हैं, जिनका वह पूरा ख्याल रखते हैं। उनका कहना है कि वे जब नेहरू युवा केंद्र से जुड़े थे, तभी उनकी इच्छा थी कि वे हेल्थ के क्षेत्र में कोई कार्य करें। इसके लिए उन्होंने एचआईवी पीड़िताओं को चुना और उनके लिए काम करना शुरू किया। इसके अतिरिक्त वे स्कूल कॉलेज में एचआईवी के लिए अवेयरनेस प्रोग्राम चलाते हैं। लोगों और बच्चों को जागरूक करते हैं।