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नई खोजः दिमागी मलेरिया से अब नहीं जाएगी जान, 41 साल की ‘तपस्या’ के बाद मिल गया इलाज

Tue, 03 Dec 2019 09:18 AM IST
खुशबू गोयल सुशील कुमार, अमर उजाला, चंडीगढ़
सुशील कुमार, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: खुशबू गोयल Updated Tue, 03 Dec 2019 09:18 AM IST
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medical research, Brain malaria treatment formula found by Dr Bhupinder Singh Bhoop
फाइल फोटो
दिमागी मलेरिया से अब किसी की जान नहीं जाएगा। क्योंकि 41 साल की तपस्या के बाद इसके इलाज का फॉर्मूला खोज निकाला गया है। आप भी जानिए क्या...
medical research, Brain malaria treatment formula found by Dr Bhupinder Singh Bhoop
फाइल फोटो
भारत समेत नाइजीरिया, कांगो, मुजब्बीन और युगांडा में दिमागी मलेरिया हर साल लाखों लोगों को लील रहा है। सर्वाधिक बच्चों की मौत हो रही है, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। दिमागी मलेरिया से लोगों को बचाने के लिए पंजाब यूनिवर्सिटी के फार्मास्युटिकल विभाग के प्रो. भूपिंदर सिंह भूप ने इलाज का तरीका खोज निकाला है। 41 साल चली रिसर्च के बाद अब जाकर कामयाबी मिली है। नेजल टू ब्रेन विधि से इलाज संभव हो सकेगा। इस रिसर्च पर आगे काम करने के लिए डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी ने प्रो. भूप व इसी विभाग के प्रोफेसर ओपी कटारे को 45 लाख का प्रोजेक्ट दिया है।
medical research, Brain malaria treatment formula found by Dr Bhupinder Singh Bhoop
फाइल फोटो
मौतों के आंकड़ों से हिल रही थीं सरकारें
2017 में 87 देशों में 22 करोड़ लोग मलेरिया की चपेट में आए। इसमें 4.50 लाख लोगों की मौत हो गई और जिन लोगों की मौत हुईं, उनमें 99.7 फीसदी लोग दिमागी मलेरिया से ग्रस्त थे। 2014 में भारत में ही 30 हजार से अधिक लोग इस बीमारी से मर गए थे। मरने वालों में झारखंड, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़ व पूरे नॉर्थ ईस्ट के लोग शामिल थे। लगातार हो रही इन मौतों के आंकड़ों से सरकारें भी हिल रही थीं। इसके इलाज के लिए करोड़ों रुपये खर्च भी किए गए, लेकिन सफलता नहीं मिल पाई। सबसे बड़ी अड़चन आ रही थी कि खून के जरिये दिमाग तक दवा नहीं पहुंच पा रही थी।
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सांकेतिक चित्र
प्रो. भूप सिंह ऐसे पहुंचे मुकाम तक
1979 से दिमागी मलेरिया का इलाज तलाशने के लिए प्रो. भूपिंदर सिंह भूप ने रिसर्च शुरू कर दिया। उन्होंने पता लगाया कि एंटी मलेरिया ड्रग को दिमाग स्वीकार नहीं कर रहा है। दवा मष्तिष्क तक नहीं पहुंच पा रही है। उन्होंने नैनो फॉर्मूले से इस पर काम करना शुरू किया। उन्होंने सबसे पहले ल्यूमिफेंट्रन व आर्टिमिथर एंटी मलेरिया दवाओं का शरीर में उपलब्धता का प्रतिशत जाना। पता लगा कि ल्यूमिफेंट्रन का 12 फीसदी व आर्टिमिथर को 40 फीसदी प्रभाव रहता है। यह दवाएं वाइवेक्स मलेरिया का ही इलाज कर पाईं। उसके बाद उन्होंने शरीर में इन दवाओं की उपलब्धता का प्रतिशत बढ़ाया।
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फाइल फोटो
अगले चरण में ड्रग डिलीवरी सिस्टम पर काम किया। उन्होंने पहले वह चीजें खोज निकालीं, जो दिमाग को पसंद होती हैं। उन्होंने ग्लेक्टोस, फिगोस, फास्फोलिपिड्स, शुगर आदि में दवाओं को मिलाकर तरल मिश्रण बनाया और उसके बाद नाक से मष्तिष्क तक दवा पहुंचाई। 99 फीसदी तक एनिमल स्टडी सफल रही। अब फार्मा कंपनियां ह्यूमन स्टडी करेंगी। प्रो. भूप ने बताया कि इस रिसर्च में रिपनदीप कौर, वरुण गोरकी, डॉ. चंद्रभूषण त्रिपाठी, गुनीत, हरमनजोत काम कर रहे हैं।
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