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मिलिए कारगिल युद्ध के एक हीरो से, जिसके बिना संभव नहीं था 'ऑपरेशन विजय'

Wed, 06 Sep 2017 09:06 AM IST
मोहित धुपड़/अमर उजाला, चंडीगढ़
मोहित धुपड़/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Wed, 06 Sep 2017 09:06 AM IST
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kargil war hero indian airforce first generation jet bomber Canberra
कारगिल युद्ध
हम आपको मिला रहे हैं कारगिल युद्ध के ऐसे हीरो से, जो दुश्मन की मिसाइल से लड़खड़ा गया था, लेकिन हिम्मत नहीं हारा और इसके बिना 'ऑपरेशन विजय' संभव भी नहीं था।
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कारगिल युद्ध
कारगिल युद्ध दुनिया की सबसे मुश्किल लड़ाई थी। क्योंकि इस युद्ध में दुश्मन ऊंची ऊंची चोटियों पर बैठा था और भारतीय सेना नीचे जमीन पर थी। ऐसे में भौगोलिक रूप से यह सबसे मुश्किल लड़ाई थी, लेकिन इसे जीतने में सबसे बड़ा हाथ रहा एयरक्राफ्ट ‘कैनबेरा’ का। कारगिल में ऑपरेशन विजय से पहले उन दुर्गम चोटियों की टोह ली जानी बेहद जरूरी थी, जहां सेना का पहुंच पाना बहुत मुश्किल था।
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कारगिल युद्ध
दुश्मन इन चोटियों पर एलओसी क्रास कर अपनी चौकियां जमा चुका था और दुश्मन की स्थिति का अंदाजा लगाए बिना ऑपरेशन विजय की कामयाबी भी मुश्किल दिख रही थी। इसलिए सेना ने दुर्गम इलाके की रेकी करवाने के लिए एयरफोर्स की मदद ली। वेस्टर्न एयर कमांड के अंतर्गत एयरफोर्स ने इस अहम काम के लिए अपने सबसे पहले व सबसे पुराने एयरक्राफ्ट ‘कैनबेरा’ का इस्तेमाल किया।
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कारगिल युद्ध
‘कैनबेरा’ एयरक्राफ्ट एलओसी की रेकी के लिए निकला और दुश्मनों के बारे में बेहद महत्वपूर्ण जानकारियां जुटा कर लौट रहा था कि दुश्मन ने मिसाइल से हमला कर दिया। हमले से यह ताकतवर एयरक्राफ्ट लड़खड़ा गया, बावजूद इसके क्रू ने बहुत ही सूझबूझ से इस एयरक्राफ्ट सुरक्षित लैंड करवाया। फिर एयरक्राफ्ट की जानकारियां थल सेना के लिए ऑपरेशन विजय को कामयाब बनाने में बेहद मददगार साबित हुईं।
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देश ही नहीं, इस एयरक्राफ्ट ने यूएनओ की ओर से भेजे गए खास आपरेशन के दौरान कांगो देश में भी अपनी कामयाबी का डंका बजाया था। यूएनओ के आग्रह पर 9 अक्तूबर 1961 को विंग कमांडर एआईके सूआरस के नेतृत्व में भारत से छह कैनबेरा एयरक्राफ्ट 6000 किमी का सफर तय कर कांगो पहुंचे थे और ऑपरेशन सफल कर लौटे थे। आज 01 सितंबर 2017 को इस एयरक्राफ्ट को 60 बरस पूरे हो चुके हैं।
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