देश आज आजादी की 74वीं वर्षगांठ मना रहा है। ये आजादी हमें लाखों कुर्बानियों के बाद मिली है। आजादी के बाद भी देश पर कुर्बान होने का सिलसिला थमा नहीं। रण बांकुरे आज भी सीमा पर हंसते-हसते अपने प्राणों को न्योछावर कर देते हैं। आज हम आपको एक ऐसे कॉलेज की गौरवगाथा बताने जा रहे हैं, जिसकी पहचान शहीदों के कॉलेज के तौर पर है।
इस कॉलेज के विद्यार्थियों की रगो में देशभक्ति का जज्बा बहता है। कॉलेज की आबोहवा में ऐसा रंग घुला है कि पहले विद्यार्थी सेना में शामिल होता है और बाद में सरहद पर जाकर दुश्मनों के छक्के छुड़ा देता है। कॉलेज के कई विद्यार्थी शहीद भी हुए हैं और उनका नाम देश के इतिहास में सुनहरे अक्षरों से लिखा जा चुका है। उनकी गाथाएंसमय-समय पर सुनाई जाती हैं। जो भी इनके शौर्यता और वीरता के किस्से सुनता है उसके रोंगटे खड़े हो जाते हैं
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चंडीगढ़
- फोटो : social media
यह कॉलेज है चंडीगढ़ के सेक्टर- 10 स्थित डीएवी कॉलेज। डीएवी प्रिंसिपल डॉ. पवन शर्मा ने बताया कि कॉलेज का गौरवपूर्ण इतिहास रहा है। यहां के कई विद्यार्थी देश की सेवा करते हुए शहीद हो चुके हैं। यहां से निकले वीरों की शहादत देश के युवाओं की प्रेरणा है। परमवीर चक्र विजेता विक्रम बत्रा, महावीर चक्र विजेता मेजर संदीप सागर, सेकेंड लेफ्टिनेंट राजीव संधू, वीर चक्र विजेता कैप्टन विजंयत थापर के नाम आज हर किसी के जुबां पर रहते हैं।
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कैप्टन विक्रम बत्रा।
- फोटो : सोशल मीडिया
यहां से निकले करीब 120 से ज्यादा विद्यार्थी देश की अलग-अलग सेनाओं में हैं। सेना में जाने के लिए कई विद्यार्थी इसी कॉलेज में एडमिशन लेते हैं। कॉलेज ने इन्हीं वीरों के सम्मान में डीएवी एडमिन ब्लॉक का नाम शौर्य भवन रखा है। कॉलेज में एनसीसी का आर्मी विंग, एयरफोर्स विंग और नेवल विंग है। जो विद्यार्थियों को सेना की तरह अनुशासित बनाता है और उनमें देश प्रेम की प्रेरणा बढ़ाता है। आइए जानते हैं वे कौन हैं, जो न सिर्फ कॉलेज की शान बनें बल्कि देश के नौजवानों के प्रेरणास्रोत हैं।
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विक्रम बत्रा
- फोटो : फाइल फोटो
विक्रम बत्रा: हिमाचल प्रदेश के पालमपुर के विक्रम बत्रा की शहादत हर बच्चे की जुबां पर है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा पालमपुर में हुई। उसके बाद वे सेक्टर- 10 डीएवी कॉलेज आ गए। साल 1996 में सेना ज्वाइन की। कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने अदम्य शौर्य दिखाया। उन्होंने अपनी टुकड़ी के साथ श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर सबसे ऊंची चोटी को पाकिस्तान के सैनिकों के छक्के छुड़ाकर अपने कब्जे में लिया। सफलता हासिल करने के बाद दूसरी चोटी को भी उन्होंने कब्जाया लेकिन इस दौरान वे बुरी तरह से घायल हुए और वीरगति को प्राप्त हुए। भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च बलिदान पुरस्कार मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया।