10 साल की रेप पीड़िता बच्चे को जन्म देगी, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने भी उसके गर्भपात की इजाजत नहीं दी। लेकिन सवाल ये हैं कि उसके बाद मां और बच्चे दोनों का क्या होगा।
इसका जबाव ये है कि बच्ची को कई सालों तक काउंसिलिंग की जरूरत पड़ सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह दस वर्षीय बच्ची और उसके अंदर पल रहे बच्चे की जान को खतरे को देखते हुए गर्भपात की इजाजत नहीं दे सकती। वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चे को जन्म देने के बाद बच्ची को बरसों तक काउंसिलिंग की जरूरत पड़ सकती है, क्योंकि उसे इस बुरे हादसे से निकालना होगा।
इसके लिए उसे तीन आर यानी रेस्पेक्ट (सम्मान), रिहैबिलिटेशन (पुनर्वास) और रिजिलियन्स (दुख से उबरने के कौशल) पर केंद्रित काउंसिलिंग की जरूरत पड़ेगी। मुंबई के मनोविज्ञानी हरीश शेट्टी कहते हैं कि उसे अच्छी काउंसिलिंग के साथ सपोर्ट की जरूरत है। उसका पुनर्वास करना होगा। उसे ऐसी जगह रखना होगा जहां उसके साथ सम्मान का व्यवहार हो। यह बच्ची परिपक्वता हासिल करने के नजरिये से अभी बहुत छोटी है।
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रोहतक में मामा ने बच्ची के साथ दुराचार किया
नई दिल्ली के मनोचिकित्सक समीर पारिख कहते हैं कि न सिर्फ बच्ची बल्कि उसके परिवार को भी मनोवैज्ञानिक सलाह की जरूरत होगी। इस तरह की सलाह बच्ची की डिलीवरी से जुड़ी त्रासदी और उस अनुभवों से गुजरने के संत्रास को कम करेगी। यह परिवार और बच्ची दोनों को बुरे दौर से गुजरने के बाद वापस सामान्य जिंदगी में आने में मदद करेगी।
मुंबई की स्त्री रोग विशेषज्ञ सोनल कुमटा का कहना है कि बच्ची की जान के लिए जन्म देना और गर्भपात दोनों बराबर जोखिम भरे हैं। मेडिकल रिपोर्ट में कहा गया था कि बच्ची के लिए गर्भपात उसकी जान के लिए खतरा बन सकता है। लिहाजा सुप्रीम कोर्ट ने गर्भपात की इजात नहीं दी थी। इसके बाद सर्वोच्च अदालत बच्ची को मुहैया कराई जा रही मेडिकल देखभाल पर संतोष जताया था।