इंसानों और जानवरों के बीच प्यार के आपने कई किस्से सुने होंगे। आचार्य चाणक्य ने भी बताया है कि इंसान चाहे तो जानवरों से अच्छी सीख ले सकता है। इन जानवरों में कुत्तों को इंसानों का सबसे अच्छा दोस्त माना जाता है। इंसान की तरक्की में भी कुत्तों का बहुत योगदान रहा है। इस जानवर के प्रति प्यार और कृतज्ञता जाहिर करने के लिए हर साल 26 अगस्त को इंटरनेशनल डॉग डे मनाया जाता है। अगर हम आपको ये बताएं कि कुत्तों ने ही इंसान की अंतरिक्ष में लंबी छलांग लगाने में मदद की, तो शायद आप यकीन न करें। तो चलिए आपको यकीन दिलाने के लिए पूरी कहानी सुनाते हैं।
अंतरिक्ष की सैर करने वाले वो कुत्ते, जो धरती पर आते ही हो गए थे मशहूर
किस्सा पचास और साठ के दशक का है। दूसरा विश्व युद्ध खत्म होते ही अमेरिका और सोवियत संघ में शीत युद्ध छिड़ गया था। अमेरिका ने पहले एटम बन बना लिया, तो सोवियत संघ अंतरिक्ष की रेस में अमेरिका को पछाड़ने में जुट गया। आज से करीब 62 साल पहले यानी तीन नवंबर, 1957 को सोवियत संघ ने स्पुतनिक 2 नाम का अंतरिक्षयान भेजा। असल में स्पुतनिक 1 की कामयाबी के बाद सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने अपने वैज्ञानिकों को एक महीने में एक कुत्ते को अंतरिक्षयान के साथ भेजने का निर्देश दिया था। इस हुक्म की तामील करने के चक्कर में वैज्ञानिकों ने ये सोचा ही नहीं कि इसकी वापसी कब होगी।
सोवियत संघ, अंतरिक्ष मिशन के शुरुआती दौर से ही कुत्तों को अंतरिक्ष के सफर पर भेजता रहा था, जब उनके हाथ जर्मन इंजीनियर वर्नहर वॉन ब्रॉन का फॉर्मूला लगा था। ब्रॉन के V2 रॉकेट की मदद से ये तजुर्बा किया जा रहा था। पहले तो धरती की कक्षा में यानी धरती का चक्कर लगाने के लिए यान भेजे जाते थे। ऐसे मिशन पर भेजे गए ज्यादातर जानवर जिंदा लौट आए थे।
उस दौर में अमेरिकी वैज्ञानिक अपने स्पेस मिशन के लिए बंदर और चिंपांजी का इस्तेमाल करते थे। वहीं सोवियत वैज्ञानिकों की पहली पसंद कुत्ते थे। मिशन के लिए सोवियत वैज्ञानिक अक्सर आवारा कुत्तों को पकड़ा करते थे। रात के वक्त सुनसान सड़कों पर कुत्तों की तलाश में वैज्ञानिक निकला करते थे। आवारा कुत्तों को अच्छा खाना-पीना और ट्रेनिंग देकर स्पेस मिशन के लिए तैयार किया जाता था। उन्हें अक्सर जोड़ों में अंतरिक्ष मिशन पर भेजा जाता था। इससे दो अलग-अलग जानवरों से मिले आंकड़ों की तुलना करने में मदद मिलती थी।