नौ ग्रहों में शनि एक महत्वपूर्ण और शक्तिशाली ग्रह है। सामान्य रूप से कुंडली में शनि का नाम लेते ही डर की स्थिति पैदा हो जाती है। शनि ढैय्या, साढ़ेसाती और पनौती जैसे शब्द और भी भयभीत करने वाले हैं, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। दरअसल ज्योतिष में शनि एक क्रूर या पापी ग्रह अवश्य है। लेकिन यह हमारे कर्मों के अनुसार ही हमें फल देता है।
यदि कोई व्यक्ति अच्छा कर्म करता है तो शनि के अच्छे फल उस व्यक्ति को प्राप्त होते हैं, जबकि बुरे कार्य करने वाले को शनि दंडित करते हैं। इसलिए तो इसे कर्मफलदाता कहा जाता है। यहां शनि ग्रह का जिक्र इसलिए कर रहे हैं क्योंकि 24 जनवरी को शनि अपनी स्वराशि मकर में प्रवेश कर रहा है। शनि के गोचर का प्रभाव सभी बारह राशियों पर ढाई वर्ष तक रहता है।
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शनि देव
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ज्योतिष में शनि ग्रह
ज्योतिष शास्त्र में शनि नौ ग्रहों में से सातवां ग्रह है। शनि ग्रह को आयु, दुख, रोग, पीड़ा, विज्ञान, तकनीकी, लोहा, खनिज तेल, कर्मचारी, सेवक, जेल आदि का कारक माना जाता है। शनि की चाल सबसे धीमी है। अत: शनि के गोचर की अवधि ढाई बरस की होती है। यानि यह एक राशि से दूसरी राशि में जाने का समय ढाई वर्ष का होता है। यह सभी राशियों को अपनी ढैय्या और साढ़ेसाती, गोचर, मार्गी एवं वक्री चाल से प्रभावित करता है।
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भ्रष्ट तंत्र विनाशक शनि मंदिर
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शनि की राशियां
शनि ग्रह राशिचक्र की दो राशियों का मालिक है - मकर और कुंभ। इन दोनों राशियों के जातक शनि से अधिक प्रभावित होते हैं।
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शनिदेव
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शनि की उच्च-नीच राशि
शनि ग्रह की उच्च राशि तुला है। जबकि मेष राशि में यह नीच भाव में होता है।
शनि के शत्रु ग्रह
सूर्य पुत्र शनि के मित्र ग्रहों में बुध और शुक्र आते हैं, जबकि सूर्य, चंद्रमा और मंगल, इसके शत्रुओं की श्रेणी में आते हैं। जबकि गुरु को इसके समभाव का माना जाता है।