सुषमा के भाषणों से नमो-नमो नदारद
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भाजपा की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज ने विदिशा से अपना प्रचार अभियान छेड़ दिया है, लेकिन उनके भाषणों में नमो-नमो का जाप कहीं दिखाई नहीं दे रहा। वह कार्यकर्ताओं को चुनाव लड़ने की बारीकियां सिखा रही हैं, यूपीए सरकार की विफलताओं पर हमला कर रही हैं।
साथ ही शिवराज सरकार की उपलब्धियां भी गिना रही हैं लेकिन नरेंद्र मोदी का जिक्र उनकी दो सभाओं में कहीं नहीं हुआ। दूसरी तरफ पूरे राज्य में मोदी के केंद्रीय प्रचार समिति की ओर से भेजे गए होर्डिंग्स हैं, जिनमें अकेले मोदी हैं।
सुषमा स्वराज ने पिछले दो दिनों में बेगमगंज और सिलवानी में सभाएं की हैं। सभाओं में वैसी ही खासी भीड़ थी, जैसी सुषमा स्वराज के कद के नेता की सभाओं में होनी चाहिए। लेकिन सुषमा का भाषण सुनने वाले यह देखकर हैरान रह गए कि उन्होंने नरेंद्र मोदी का नाम जहां तक संभव हो सका, नहीं लिया, बल्कि सुषमा स्वराज ने मीडिया से यह कहकर भाजपा में ध्रुवीकरण के साफ संकेत दे दिए कि जसवंत सिंह के नाम पर केंद्रीय चुनाव समिति में कोई विचार नहीं किया गया।
सुषमा के सामने मैदान में दिग्गी के भाई
सुषमा स्वराज को वर्ष 2009 में तो विदिशा से कोई चुनौती नहीं मिली थी, इस बार दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह को कांग्रेस ने मैदान में उतारा है। जहां लक्ष्मण सिंह का चुनावी राजनीति में पुनर्वास है, वहीं सुषमा स्वराज को थोड़ी मेहनत करनी पड़ सकती है।
वर्ष 2009 में तो दिग्विजय सिंह के ही समर्थक राजकुमार पटेल का फार्म तकनीकी गड़बड़ी के कारण निरस्त हो गया था और सुषमा स्वराज को मैदान खुला मिल गया था। राजनीति में उनके आलोचकों ने इसे फिक्सिंग बताया था।
अब कांग्रेस के जगदीश यादव जैसे नेता हैं, जो इसे डील बता रहे हैं। उनका कहना है कि लक्ष्मण सिंह भी भाजपा से आए हैं और भाजपा के खिलाफ लड़ रहे हैं। लेकिन लक्ष्मण सिंह, सुषमा स्वराज के बाहरी होने को मुद्दा बना रहे हैं।
वे कहते हैं कि सुषमा स्वराज जनता से कभी मिलती नहीं हैं। बहरहाल सुषमा जब मोदी लहर का लाभ नहीं लेना चाहतीं, उनके लिए पूरी चुनावी लड़ाई शिवराज सिंह चौहान के इर्द-गिर्द केंद्रित हो जाती है।
उनकी रणनीति कांग्रेस की केंद्र सरकार की विफलताओं और शिवराज सरकार की उपलब्धियों के आसपास चल रही है। उनके भाषणों से साफ नजर आ रहा है कि वह मोदी लहर में डुबकी लगाने को तैयार नहीं।
