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Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   The size of the Ganesha idol is increasing year by year, a rare Ganesha idol from the Kalchuri period.

एमपी: अमरकंटक जाने से पहले यहां क्यों रुकते हैं श्रद्धालु? जंगल में विराजे स्वयंभू गणेश महाराज का अनोखा रहस्य

Sun, 06 Sep 2026 03:54 PM IST
शहडोल ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शहडोल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शहडोल Published by: शहडोल ब्यूरो Updated Sun, 06 Sep 2026 03:54 PM IST
सार

अनूपपुर के धरहर कला स्थित प्राचीन गणेश मंदिर को अमरकंटक यात्रा का महत्वपूर्ण आस्था केंद्र माना जाता है। स्वयंभू गणेश प्रतिमा, चौंसठ योगिनी मंदिर, गौरी कुंड, कल्चुरीकालीन अवशेष और आम्रवन इस स्थल को धार्मिक, प्राकृतिक व पुरातात्विक दृष्टि से खास बनाते हैं।

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The size of the Ganesha idol is increasing year by year, a rare Ganesha idol from the Kalchuri period.
जंगलों के बीच स्थित मंदिर। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

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मां नर्मदा की उद्गम स्थली अमरकंटक पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ क्षेत्र में स्थित धरहर कला का प्राचीन गणेश मंदिर आस्था का महत्वपूर्ण पड़ाव है। स्थानीय मान्यता है कि अमरकंटक पहुंचने से पहले धरहर के स्वयंभू गणेश महाराज के दर्शन करने के बाद ही मां नर्मदा की पूजा-अर्चना का फल पूर्ण होता है। यही वजह है कि अमरकंटक जाने वाले अनेक श्रद्धालु पहले धरहर पहुंचकर गणेश जी के दर्शन और पूजन करते हैं, इसके बाद अपनी यात्रा आगे बढ़ाते हैं।

स्थानीय लोगों का दावा है कि प्राचीन गणेश प्रतिमा का आकार साल दर साल बढ़ रहा है। मान्यता है कि प्रतिमा हर वर्ष चावल के एक दाने के बराबर बढ़ती है, हालांकि इस संबंध में वैज्ञानिक या पुरातात्विक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

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घने जंगलों के बीच स्थित है प्राचीन मंदिर
पुष्पराजगढ़ तहसील मुख्यालय से करीब 7 किलोमीटर और राजेंद्रग्राम से लगभग 5 किलोमीटर दूर स्टेट हाईवे क्रमांक 9ए पर अमरकंटक मार्ग में घने जंगलों के बीच यह प्राचीन धार्मिक स्थल स्थित है। धरहर का यह क्षेत्र धार्मिक आस्था के साथ पुरातात्विक और प्राकृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां स्थापित गणेश प्रतिमा को कल्चुरीकालीन बताया जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार प्रतिमा स्वयंभू है और प्रतिवर्ष चावल के एक दाने के बराबर अपने आकार में वृद्धि करती है।
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पूर्वमुखी और चतुर्भुज गणेश प्रतिमा की अपनी अलग विशेषता
धरहर में स्थापित गणेश प्रतिमा अपने विशिष्ट स्वरूप के कारण सामान्य गणेश प्रतिमाओं से अलग मानी जाती है। यह पूर्वमुखी और चतुर्भुज प्रतिमा है, जो मूषक पर विराजमान है। प्रतिमा में गणेश जी को जनेऊ धारण किए हुए दिखाया गया है और एक हाथ में कटोरा भी है। जानकार इस स्वरूप को सनातन परंपरा में उपनयन संस्कार के बाद बटुक को शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजे जाने की परंपरा से जोड़कर देखते हैं। प्रतिमा के हाथों में फरसा और वेद धारण किए होने की बात भी बताई जाती है। इसी विशिष्ट स्वरूप के कारण इसे दुर्लभ गणेश प्रतिमाओं में से एक माना जाता है। प्रतिमा की सूंड वामावर्त है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस प्रकार के गणेश स्वरूप का तंत्र साधना में विशेष महत्व है और इसे सिद्धिविनायक स्वरूप से भी जोड़ा जाता है।

गणेश मंदिर के पास चौंसठ योगिनी मंदिर
धरहर की खासियत केवल प्राचीन गणेश प्रतिमा तक सीमित नहीं है। गणेश मंदिर के समीप चौंसठ योगिनी मंदिर भी स्थित है। एक ही क्षेत्र में गणेश और चौंसठ योगिनी परंपरा से जुड़े धार्मिक स्थलों की मौजूदगी इस स्थान के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व को और बढ़ाती है। जानकारों के अनुसार कल्चुरी काल, विशेषकर दसवीं शताब्दी के आसपास, मध्य भारत में इस प्रकार के धार्मिक केंद्रों का निर्माण और विकास हुआ था। उस दौर में मंदिर परिसर केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं थे, बल्कि शिक्षा, साधना और ज्ञान परंपरा से जुड़े केंद्र भी हुआ करते थे। गणेश प्रतिमा और चौंसठ योगिनी मंदिर का यह परिसर किसी प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े कई रहस्यों को अपने भीतर समेटे हुए प्रतीत होता है। पुरातात्विक अध्ययन से क्षेत्र के इतिहास की कई अनदेखी कड़ियां सामने आ सकती हैं।

गौरी कुंड में 12 महीने बना रहता है जलस्रोत
धरहर गणेश मंदिर परिसर की पूर्व दिशा में गौरी कुंड स्थित है। स्थानीय लोगों के अनुसार यहां प्राकृतिक रूप से निकलने वाला शीतल और मीठे जल का स्रोत वर्षभर बना रहता है। गौरी कुंड के समीप शिव-पार्वती की प्राचीन प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। स्थानीय आस्था के अनुसार गौरी कुंड के पवित्र जल से ही गणेश जी के विभिन्न पूजन कार्य किए जाते हैं। मंदिर, प्राचीन प्रतिमाएं, प्राकृतिक जलस्रोत और घने जंगल इस पूरे क्षेत्र को धार्मिक आस्था और प्राकृतिक सौंदर्य का अनूठा संगम बनाते हैं।

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कालिदास के ‘आम्रकूट’ से भी जोड़ते हैं जानकार
धरहर क्षेत्र की प्राचीनता को लेकर स्थानीय जानकार इसे संस्कृत साहित्य की परंपरा से भी जोड़ते हैं। महाकवि कालिदास के मेघदूत में ‘आम्रकूट’ शब्द का उल्लेख मिलता है। कुछ जानकारों का मत है कि कालिदास द्वारा वर्णित आम्रकूट का संबंध इसी क्षेत्र से हो सकता है। इसके पीछे यहां मौजूद पुराने और घने आम के जंगलों को आधार माना जाता है। क्षेत्र में सदियों पुराने आम के पेड़ और आम्रवन की मौजूदगी इस लोकमान्यता को एक अलग सांस्कृतिक संदर्भ देती है। हालांकि, आम्रकूट की ऐतिहासिक और भौगोलिक पहचान को लेकर विद्वानों के अलग-अलग मत हैं। इसलिए इसे प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य के बजाय स्थानीय और विद्वत मत के रूप में देखा जाना चाहिए।

कभी खुले आसमान के नीचे थी गणेश प्रतिमा
स्थानीय लोगों के अनुसार धरहर की गणेश प्रतिमा पहले जंगल में खुले आसमान के नीचे स्थापित थी। बाद में ग्रामीणों और श्रद्धालुओं ने मिलकर प्रतिमा की सुरक्षा और नियमित पूजा-अर्चना के लिए मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर परिसर और आसपास कल्चुरीकालीन शिव, ब्रह्मा और विष्णु सहित अन्य प्राचीन प्रतिमाएं भी मौजूद हैं। ये प्रतिमाएं क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक परंपरा, मूर्तिकला और स्थापत्य कला की समृद्ध विरासत की ओर संकेत करती हैं।

बसंत पंचमी पर लगता है मेला
धरहर में प्रतिवर्ष बसंत पंचमी के अवसर पर मेला लगता है। आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के लिए यह आयोजन आस्था और परंपरा का प्रमुख केंद्र है। मेले के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु और ग्रामीण यहां पहुंचते हैं। घने जंगलों के बीच स्थित यह क्षेत्र हरियाली, प्राकृतिक जलस्रोत और पक्षियों के कलरव के कारण बेहद मनोरम दिखाई देता है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं को धार्मिक वातावरण के साथ प्रकृति का नैसर्गिक सौंदर्य भी आकर्षित करता है।

पुरातात्विक संरक्षण की जरूरत
धरहर की पहचान केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि आस्था, प्राचीन मूर्तिकला, कल्चुरीकालीन विरासत, प्राकृतिक जलस्रोत और लोकपरंपराओं के संगम के रूप में भी होती है। ऐसे में यहां मौजूद प्राचीन प्रतिमाओं और पुरातात्विक अवशेषों के संरक्षण की आवश्यकता महसूस की जा रही है। बताया जाता है कि पुरातत्व विभाग की ओर से धरहर की इस विरासत के संरक्षण और मंदिर परिसर के विकास के प्रयास किए जा रहे हैं। अक्टूबर 2021 में तत्कालीन शहडोल संभागायुक्त राजीव शर्मा ने भी धरहर पहुंचकर यहां के प्राकृतिक वातावरण, पुरातात्विक महत्व और धार्मिक विरासत का अवलोकन किया था।

धरहर का यह प्राचीन परिसर आज भी कई सवाल अपने भीतर समेटे हुए है। दसवीं शताब्दी के कल्चुरीकाल में यहां किस प्रकार की धार्मिक और शैक्षणिक गतिविधियां संचालित होती थीं, चौंसठ योगिनी और गणेश उपासना का आपसी संबंध क्या था और इस क्षेत्र का प्राचीन आम्रकूट से वास्तव में कितना संबंध रहा—इन सवालों के वैज्ञानिक और पुरातात्विक अध्ययन से कई नई जानकारियां सामने आ सकती हैं। अमरकंटक की ओर जाने वाले मार्ग में जंगलों के बीच स्थित धरहर आज भी आस्था और इतिहास का ऐसा पड़ाव है, जहां स्वयंभू गणेश महाराज की मान्यता, प्राचीन कल्चुरीकालीन मूर्तियां, चौंसठ योगिनी परंपरा, गौरी कुंड का बारहमासी जलस्रोत और सदियों पुराने आम्रवन एक साथ इस भूभाग की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की कहानी कहते नजर आते हैं।

दिनेश पाठक, सचिव, मंदिर समिति ने कहा कि धरहर गणेश महाराज के प्रति क्षेत्र में वर्षों से गहरी आस्था है। अमरकंटक जाने वाले श्रद्धालु यहां दर्शन के बाद ही आगे बढ़ते हैं। मंदिर की प्राचीन विरासत को संरक्षित करना जरूरी है।”

वहीं पं. कामता प्रसाद पाठक, सेवानिवृत्त शिक्षक एवं पुजारी ने कहा कि धरहर के गणेश महाराज की महिमा पीढ़ियों से चली आ रही है। श्रद्धालु यहां मनोकामना लेकर आते हैं और गौरी कुंड के जल से पूजा-अर्चना करते हैं।

रवि त्रिपाठी, शोधार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के अनुसार धरहर धार्मिक आस्था के साथ ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। गणेश प्रतिमा, चौंसठ योगिनी मंदिर और प्राचीन अवशेष गंभीर शोध की मांग करते हैं।

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