Sagar News: सागर का अनोखा बैंक, जहां होता है किताबों का लेनदेन, जानिए कैसे बदल सकते हैं
सागर शहर के उपनगर मकरोनिया में रहने वाले इंजीनियर डीके सिंह ने अपने साथियों के साथ मिलकर इस बैंक की शुरुआत की। जिसमें स्कूली बच्चे और अभिभावक कक्षा 1 से 12वीं तक की पुस्तकें जमा कर सकते हैं और प्राप्त भी कर सकते हैं।
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बैंक शब्द सामने आते ही आपके मन में ऐसी संस्था की छवि उभरती है, जहां लोग पैसे जमा करते हैं, निकालते हैं या अन्य बैंकिंग कार्य करते हैं। लेकिन, सागर में एक ऐसा बैंक है, जिसके शुरू होने का इंतजार स्कूली बच्चे और उनके अभिभावक करते हैं। इस बैंक में न तो कोई बोर्ड लगा है और न ही कोई बैंक जैसा तामझाम। लेकिन, इस बैंक का काम विद्यार्थियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इस बैंक का नाम है 'बुक बैंक', जिसे सागर के कुछ जागरूक लोगों ने शुरू किया है। इस बैंक से स्कूली बच्चों को मुफ्त में किताबें प्रदान की जाती हैं। बैंक में बच्चे अपनी पिछली कक्षा की पुस्तकें जमा कर सकते हैं और नई कक्षा की पुस्तकें प्राप्त कर सकते हैं।
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दरअसल, प्रतिष्ठित विद्यालय में अपने बच्चे को पढ़ाना प्रत्येक माता-पिता का सपना होता है, लेकिन इन विद्यालयों की फीस और वहां चलने वाली पुस्तकें काफी महंगी होती हैं। जब अभिभावक विद्यालयों से पुस्तकें खरीदते हैं, तो इसका सीधा असर उनकी जेब पर पड़ता है। ऐसे में सागर शहर के उपनगर मकरोनिया में रहने वाले इंजीनियर डीके सिंह ने अपने साथियों के साथ मिलकर इस बैंक की शुरुआत की। जिसमें स्कूली बच्चे और अभिभावक कक्षा 1 से 12वीं तक की पुस्तकें जमा कर सकते हैं और प्राप्त भी कर सकते हैं। यह पुस्तकें वे शहरभर के बच्चों से एकत्र करते हैं और जरूरतमंद विद्यार्थियों को मुफ्त में प्रदान करते हैं। उनका कहना है कि ऐसा करने से उन्हें मानसिक संतोष मिलता है। इस कार्य में उनके मित्र भी सहयोग करते हैं। उनकी कोशिश है कि इस पहल को और अधिक व्यापक बनाया जाए, ताकि अभिभावकों को आर्थिक रूप से राहत मिल सके।
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लोगों का समर्थन और पुस्तक दान
बुक बैंक टीम के सदस्य पुष्पेंद्र राजपूत ने कहा कि हर साल लोग हजारों रुपए की किताबें खरीदते हैं और बाद में उन्हें 50-100 रुपए में रद्दी में बेच देते हैं। इसके बजाय अब वे इन पुस्तकों को इस बैंक में दान कर जाते हैं और अगली कक्षा की पुस्तकें यहीं से प्राप्त कर लेते हैं। बुक बैंक की टीम ने अपनी कार में पुस्तकों को रखा हुआ है। जो अभिभावक या बच्चे उनके पास नहीं आ सकते, उन्हें वे घर तक जाकर किताबें पहुंचा देते हैं। इसके लिए उन्होंने एक व्हाट्सएप ग्रुप भी बना रखा है, जिससे उपलब्ध पुस्तकों की जानकारी लोगों तक आसानी से पहुंच सके।

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