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मध्य प्रदेश: महिलाओं को कम आंकना लैंगिक पूर्वाग्रह, निचली अदालत के तर्क पर हाईकोर्ट सख्त
Tue, 06 Oct 2026 04:13 PM IST
दिनेश शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ग्वालियर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ग्वालियर
Published by: दिनेश शर्मा
Updated Tue, 06 Oct 2026 04:13 PM IST
सार
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने पैतृक संपत्ति विवाद में महिला की क्षमता पर सवाल उठाने वाले निचली अदालत के तर्क को लैंगिक पूर्वाग्रह वाला माना। कोर्ट ने 18 दिन की देरी माफ कर द्वितीय अपील स्वीकार की और मामला गंजबासौदा एडीजे कोर्ट को नए सिरे से गुण-दोष के आधार पर सुनने भेज दिया
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मप्र हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने महिलाओं की क्षमता को कम आंकने और लैंगिक पूर्वाग्रह से ग्रस्त सोच पर बेहद सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने एक दीवानी मुकदमे की सुनवाई करते समय निचली अदालत द्वारा दिए गए तर्क को महिला विरोधी तथा पूर्वाग्रह से ग्रसित बताया। उच्च न्यायालय ने यह साफ किया कि परिवार के अंदर किसी महिला की क्षमता को पुरुष सदस्यों से कम आंकना एक लैंगिक विषमता और संकीर्ण मानसिकता को उजागर करता है। अदालत ने विदिशा जिले के गंजबासौदा स्थित अदालत के फैसले पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। हाईकोर्ट ने याचिका दाखिल करने में हुई देरी को माफ करते हुए मामले की नए सिरे से सुनवाई करने के निर्देश दिए हैं।
पैतृक संपत्ति विवाद की पृष्ठभूमि
यह संपूर्ण विवाद विदिशा जिले के अंतर्गत आने वाले गंजबासौदा क्षेत्र की एक पैतृक संपत्ति से संबंधित है। वर्ष 2011 में गंजबासौदा की दीवानी अदालत में जुगरी और उनके पुत्र गोरेलाल के बच्चों इमरत सिंह, मोहरा बाई, खुमान सिंह, दातार सिंह तथा इमरत सिंह ने संपत्ति में अपना अधिकार मांगते हुए एक याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ताओं ने यह दीवानी मुकदमा चिमना, मुन्ना सहित नौ लोगों के खिलाफ प्रस्तुत किया था। हालांकि, दीवानी मामले की सुनवाई करते हुए विचारण न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं के दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया था। अदालत का कहना था कि याचिकाकर्ता पैतृक संपत्ति से जुड़े अपने दावों के समर्थन में कोई पुख्ता प्रमाण या साक्ष्य पेश नहीं कर पाए। इस फैसले से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ताओं ने गंजबासौदा स्थित प्रथम अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे) की अदालत में प्रथम अपील दाखिल करने का निर्णय लिया।
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निचली अदालत का आपत्तिजनक तर्क
गंजबासौदा की एडीजे कोर्ट में प्रथम अपील दाखिल करने की प्रक्रिया में याचिकाकर्ताओं से 18 दिन का विलंब हो गया था। अपील में हुई इस देरी के कारण को स्पष्ट करते हुए याचिकाकर्ता मोहरा बाई ने अदालत को बताया कि वह गंभीर रूप से बीमार थीं। उस समय 35 वर्ष की मोहरा बाई ने यह भी जानकारी दी कि इस पूरे केस की पैरवी और अदालती प्रक्रिया की देखरेख वही स्वयं कर रही थीं। हालांकि, एडीजे कोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह आधारहीन मानते हुए अपील को निरस्त कर दिया था। निचली अदालत ने फैसला सुनाते समय यह तर्क दिया कि 35 वर्षीय मोहरा बाई के परिवार में उनसे अधिक आयु के पुरुष सदस्य भी मौजूद हैं। अदालत के अनुसार कोई बुजुर्ग पुरुष सदस्य किसी विधिक प्रक्रिया के संचालन के लिए 35 साल की महिला पर निर्भर रहे, यह बात तर्कसंगत नहीं लगती। निचली अदालत ने बिना किसी ठोस साक्ष्य के केवल अटकलों के आधार पर देरी को अनुचित माना था।
हाईकोर्ट का कड़ा रुख और आदेश
वर्ष 2015 में यह मामला द्वितीय अपील के माध्यम से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ के समक्ष पहुंचा। लंबी न्यायिक सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की पीठ ने 11 सितंबर 2026 को इस विषय पर अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया था। इसके पश्चात, 1 अक्तूबर 2026 को अंतिम फैसला सुनाते हुए उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के रवैये पर भारी असंतोष प्रकट किया। हाईकोर्ट ने कहा कि परिवार के बुजुर्ग पुरुषों का अपने से छोटी महिला पर निर्भर न हो सकने का तर्क किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं है। यह सोच स्पष्ट रूप से लैंगिक पूर्वाग्रह को दर्शाती है। अदालत ने रेखांकित किया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई आधार नहीं था जिसके आधार पर निचली अदालत अनुमानों से भरे निर्णय सुनाए। उच्च न्यायालय ने 18 दिन के विलंब को क्षमा करते हुए द्वितीय अपील को स्वीकार कर लिया। अदालत ने इस मामले को पुनः गंजबासौदा एडीजे कोर्ट को भेजते हुए निर्देश दिया कि वह अपील को स्वीकार कर गुण-दोष के आधार पर आगे की सुनवाई करे। साथ ही, सभी पक्षकारों को 15 अक्तूबर को एडीजे कोर्ट गंजबासौदा के समक्ष उपस्थित होने का आदेश जारी किया गया है।
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पैतृक संपत्ति विवाद की पृष्ठभूमि
यह संपूर्ण विवाद विदिशा जिले के अंतर्गत आने वाले गंजबासौदा क्षेत्र की एक पैतृक संपत्ति से संबंधित है। वर्ष 2011 में गंजबासौदा की दीवानी अदालत में जुगरी और उनके पुत्र गोरेलाल के बच्चों इमरत सिंह, मोहरा बाई, खुमान सिंह, दातार सिंह तथा इमरत सिंह ने संपत्ति में अपना अधिकार मांगते हुए एक याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ताओं ने यह दीवानी मुकदमा चिमना, मुन्ना सहित नौ लोगों के खिलाफ प्रस्तुत किया था। हालांकि, दीवानी मामले की सुनवाई करते हुए विचारण न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं के दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया था। अदालत का कहना था कि याचिकाकर्ता पैतृक संपत्ति से जुड़े अपने दावों के समर्थन में कोई पुख्ता प्रमाण या साक्ष्य पेश नहीं कर पाए। इस फैसले से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ताओं ने गंजबासौदा स्थित प्रथम अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे) की अदालत में प्रथम अपील दाखिल करने का निर्णय लिया।
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निचली अदालत का आपत्तिजनक तर्क
गंजबासौदा की एडीजे कोर्ट में प्रथम अपील दाखिल करने की प्रक्रिया में याचिकाकर्ताओं से 18 दिन का विलंब हो गया था। अपील में हुई इस देरी के कारण को स्पष्ट करते हुए याचिकाकर्ता मोहरा बाई ने अदालत को बताया कि वह गंभीर रूप से बीमार थीं। उस समय 35 वर्ष की मोहरा बाई ने यह भी जानकारी दी कि इस पूरे केस की पैरवी और अदालती प्रक्रिया की देखरेख वही स्वयं कर रही थीं। हालांकि, एडीजे कोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह आधारहीन मानते हुए अपील को निरस्त कर दिया था। निचली अदालत ने फैसला सुनाते समय यह तर्क दिया कि 35 वर्षीय मोहरा बाई के परिवार में उनसे अधिक आयु के पुरुष सदस्य भी मौजूद हैं। अदालत के अनुसार कोई बुजुर्ग पुरुष सदस्य किसी विधिक प्रक्रिया के संचालन के लिए 35 साल की महिला पर निर्भर रहे, यह बात तर्कसंगत नहीं लगती। निचली अदालत ने बिना किसी ठोस साक्ष्य के केवल अटकलों के आधार पर देरी को अनुचित माना था।
हाईकोर्ट का कड़ा रुख और आदेश
वर्ष 2015 में यह मामला द्वितीय अपील के माध्यम से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ के समक्ष पहुंचा। लंबी न्यायिक सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की पीठ ने 11 सितंबर 2026 को इस विषय पर अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया था। इसके पश्चात, 1 अक्तूबर 2026 को अंतिम फैसला सुनाते हुए उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के रवैये पर भारी असंतोष प्रकट किया। हाईकोर्ट ने कहा कि परिवार के बुजुर्ग पुरुषों का अपने से छोटी महिला पर निर्भर न हो सकने का तर्क किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं है। यह सोच स्पष्ट रूप से लैंगिक पूर्वाग्रह को दर्शाती है। अदालत ने रेखांकित किया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई आधार नहीं था जिसके आधार पर निचली अदालत अनुमानों से भरे निर्णय सुनाए। उच्च न्यायालय ने 18 दिन के विलंब को क्षमा करते हुए द्वितीय अपील को स्वीकार कर लिया। अदालत ने इस मामले को पुनः गंजबासौदा एडीजे कोर्ट को भेजते हुए निर्देश दिया कि वह अपील को स्वीकार कर गुण-दोष के आधार पर आगे की सुनवाई करे। साथ ही, सभी पक्षकारों को 15 अक्तूबर को एडीजे कोर्ट गंजबासौदा के समक्ष उपस्थित होने का आदेश जारी किया गया है।
