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मंजर भोपाली की दो टूक: विवेक अग्निहोत्री में ही कुछ कमी रही होगी जो उन्हें भोपाली में होमोसेक्शुअल दिखता है
Sat, 26 Mar 2022 04:02 PM IST
आनंद पवार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
Published by: आनंद पवार
Updated Sat, 26 Mar 2022 04:02 PM IST
सार
विवेक अग्निहोत्री ने भोपाल और भोपाली होने पर सवाल उठाए हैं। इससे भोपाल में लोग खासे नाराज हैं। खासकर वे लोग जो भोपाली तहजीब के लिए जाने जाते हैं। अपने आपको भोपाली कहलाना पसंद करते हैं। ऐसे ही एक शख्स हैं मशहूर शायर मंजर भोपाली। हमने विवेक अग्निहोत्री के बयान पर उनसे बातचीत की। पेश है उनसे बातचीत के मुख्य अंश
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मंजर भोपाली और विवेक अग्निहोत्री
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
विवेक अग्निहोत्री ने भोपाल और भोपाली होने पर सवाल उठाए हैं। इससे भोपाल में लोग खासे नाराज हैं। खासकर वे लोग जो भोपाली तहजीब के लिए जाने जाते हैं। अपने आपको भोपाली कहलाना पसंद करते हैं। ऐसे ही एक शख्स हैं मशहूर शायर मंजर भोपाली। हमने विवेक अग्निहोत्री के बयान पर उनसे बातचीत की। पेश है उनसे बातचीत के मुख्य अंश
सवाल: विवेक अग्निहोत्री का कहना है कि जब वह 4 साल के थे, तब भोपाली मतलब होमोसेक्शुअल समझा जाता था।
जवाब: विवेक अग्निहोत्री अपने बयान में कुछ छिपा रहे है। 3-4 साल के बच्चे को कैसे पता कि यह सब चीजें भोपाल में होती है। इस उम्र का बच्चा तो अपनी मां की गोद में रहता है। अंगुली पकड़े बिना बाहर भी नहीं आता। इस तरह की बात करके अग्निहोत्री ने अपना कद छोटा कर लिया है। अब वह पचास बयान देते रहे। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि इस तरह की बयानबाजी से भोपाल और भोपालियों को क्यों बदनाम किया जा रहा है? उनका मकसद क्या है? पहले तो यह बताए।
सवाल: वह भोपाल और भोपालवासियों को क्यों बदनाम करना चाहेंगे?
जवाब: मैंने अपनी 60 साल की उम्र में यह पहला आदमी देखा है, जो इस तरह की बात कर रहा है। हम भी बच्चे थे। कई लोग आज हमारे साथ बड़े हुए हैं। वह जमाना तो बहुत मुश्किल जमाना था। लड़का 15 साल का हो जाता था, तो भी उसे नहीं मालूम होता था कि सेक्स क्या होता है। विवेक साहब के साथ ऐसा क्या हुआ। या तो वह खुद ही लोगों को ऑफर देते होंगे। इनके अंदर ही कोई कमी होगी। यकीनन फिर तो कोई भी करीब आ सकता है। जो बात उन्होंने कही, यह उनकी आपबीती हो सकती है। वह जब बड़े हुए होंगे तो किसी न किसी ने उन्हें गहरे जख्म दिए होंगे।
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सवाल: विवेक का कहना है कि आज का मतलब बदल गया है। आप क्या कहेंगे?
जवाब: भोपाल का मतलब विवेक अग्निहोत्री मैं नहीं मानता। भोपाल उनके किसी जुमले का मोहताज नहीं है। भोपाल ने बड़े-बड़े सियासतदान, हॉकी खिलाड़ी और सितारे दिए हैं। बरकतउल्लाह भोपाली, शंकर दयाल शर्मा, केएन प्रधान, कैलाश सारंग, जया बच्चन, असलम शेर खान, इनाम उर रहमान, राजीव वर्मा, ध्यानचंद के बेटे यह सब भोपाली हैं। इन्होंने अपना बचपन यहां गुजारा है। उन्हें अपनी शौहरत के लिए इस तरह की बात नहीं करना चाहिए थी। किसी शहर को बदनाम करना ठीक नहीं है। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए।
सवाल: आपके बचपन से भोपाल की किस तरह की यादें जुड़ी हैं?
जवाब: भोपाल बहुत छोटा-सा शहर था। स्टेशन से लेकर बुधवारा और टीटी नगर से रोशनपुरा तक ही पूरा शहर बसा था। टांगे चलते थे। टांगे वाले भी इतने काबिल थे कि आपको मंजिल तक पहुंचाने से पहले 50 से ज्यादा शेर और किस्से सुना देते थे। शाम को पटिये रोशन होते थे। एक तरफ बुजुर्ग, सियासतदान और दूसरी तरफ नौजवान बैठते थे। कोई शायरी तो कोई नाटक की बात तो कोई सियासत की बात करता था। भोपाल की पहचान ही पटियों से थी। सड़क चौड़ीकरण के नाम पर पटियों को तोड़ दिया गया। उसके साथ ही हमारी तहजीब भी बिखर गई। उस समय पटियों पर ही तरबियत होती थी। हमने पटिए पर ही शायरी सीखी।
सवाल: द कश्मीर फाइल्स फिल्म के बारे में आप क्या कहेंगे?
जवाब: यह फिल्म सच्ची है तो पाकिस्तान में रिलीज होना थी। यहां के मुसलमानों का फिल्म से क्या लेना-देना? जब वहां के लोग देखते तो हम वहां के मुसलमानों से सवाल कर सकते थे कि देखिए आपकी वजह से हम शर्मिंदा है। यहां नफरत फैलाने से क्या होगा? और यदि यह सिर्फ कहानी है तो यहीं कहूंगा कि बैसाखी पर कोई चीज ज्यादा दिन नहीं टिकती।
सवाल: आप फिल्म देखने जाएंगे?
जवाब: मैं जरूर फिल्म देखने जाउंगा। मैं शायर, गीतकार हूं। मेरा फिल्म को लेकर सवाल भी है कि यह क्यों बनाई गई है? यदि पैसा कमाने के लिए बनाई है तो खत्म हो जाएगी। हमेशा जिंदा नहीं रहेगी। बड़ी-बड़ी फिल्में आई और चली गई।
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सवाल: विवेक अग्निहोत्री का कहना है कि जब वह 4 साल के थे, तब भोपाली मतलब होमोसेक्शुअल समझा जाता था।
जवाब: विवेक अग्निहोत्री अपने बयान में कुछ छिपा रहे है। 3-4 साल के बच्चे को कैसे पता कि यह सब चीजें भोपाल में होती है। इस उम्र का बच्चा तो अपनी मां की गोद में रहता है। अंगुली पकड़े बिना बाहर भी नहीं आता। इस तरह की बात करके अग्निहोत्री ने अपना कद छोटा कर लिया है। अब वह पचास बयान देते रहे। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि इस तरह की बयानबाजी से भोपाल और भोपालियों को क्यों बदनाम किया जा रहा है? उनका मकसद क्या है? पहले तो यह बताए।
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सवाल: वह भोपाल और भोपालवासियों को क्यों बदनाम करना चाहेंगे?
जवाब: मैंने अपनी 60 साल की उम्र में यह पहला आदमी देखा है, जो इस तरह की बात कर रहा है। हम भी बच्चे थे। कई लोग आज हमारे साथ बड़े हुए हैं। वह जमाना तो बहुत मुश्किल जमाना था। लड़का 15 साल का हो जाता था, तो भी उसे नहीं मालूम होता था कि सेक्स क्या होता है। विवेक साहब के साथ ऐसा क्या हुआ। या तो वह खुद ही लोगों को ऑफर देते होंगे। इनके अंदर ही कोई कमी होगी। यकीनन फिर तो कोई भी करीब आ सकता है। जो बात उन्होंने कही, यह उनकी आपबीती हो सकती है। वह जब बड़े हुए होंगे तो किसी न किसी ने उन्हें गहरे जख्म दिए होंगे।
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सवाल: विवेक का कहना है कि आज का मतलब बदल गया है। आप क्या कहेंगे?
जवाब: भोपाल का मतलब विवेक अग्निहोत्री मैं नहीं मानता। भोपाल उनके किसी जुमले का मोहताज नहीं है। भोपाल ने बड़े-बड़े सियासतदान, हॉकी खिलाड़ी और सितारे दिए हैं। बरकतउल्लाह भोपाली, शंकर दयाल शर्मा, केएन प्रधान, कैलाश सारंग, जया बच्चन, असलम शेर खान, इनाम उर रहमान, राजीव वर्मा, ध्यानचंद के बेटे यह सब भोपाली हैं। इन्होंने अपना बचपन यहां गुजारा है। उन्हें अपनी शौहरत के लिए इस तरह की बात नहीं करना चाहिए थी। किसी शहर को बदनाम करना ठीक नहीं है। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए।
सवाल: आपके बचपन से भोपाल की किस तरह की यादें जुड़ी हैं?
जवाब: भोपाल बहुत छोटा-सा शहर था। स्टेशन से लेकर बुधवारा और टीटी नगर से रोशनपुरा तक ही पूरा शहर बसा था। टांगे चलते थे। टांगे वाले भी इतने काबिल थे कि आपको मंजिल तक पहुंचाने से पहले 50 से ज्यादा शेर और किस्से सुना देते थे। शाम को पटिये रोशन होते थे। एक तरफ बुजुर्ग, सियासतदान और दूसरी तरफ नौजवान बैठते थे। कोई शायरी तो कोई नाटक की बात तो कोई सियासत की बात करता था। भोपाल की पहचान ही पटियों से थी। सड़क चौड़ीकरण के नाम पर पटियों को तोड़ दिया गया। उसके साथ ही हमारी तहजीब भी बिखर गई। उस समय पटियों पर ही तरबियत होती थी। हमने पटिए पर ही शायरी सीखी।
सवाल: द कश्मीर फाइल्स फिल्म के बारे में आप क्या कहेंगे?
जवाब: यह फिल्म सच्ची है तो पाकिस्तान में रिलीज होना थी। यहां के मुसलमानों का फिल्म से क्या लेना-देना? जब वहां के लोग देखते तो हम वहां के मुसलमानों से सवाल कर सकते थे कि देखिए आपकी वजह से हम शर्मिंदा है। यहां नफरत फैलाने से क्या होगा? और यदि यह सिर्फ कहानी है तो यहीं कहूंगा कि बैसाखी पर कोई चीज ज्यादा दिन नहीं टिकती।
सवाल: आप फिल्म देखने जाएंगे?
जवाब: मैं जरूर फिल्म देखने जाउंगा। मैं शायर, गीतकार हूं। मेरा फिल्म को लेकर सवाल भी है कि यह क्यों बनाई गई है? यदि पैसा कमाने के लिए बनाई है तो खत्म हो जाएगी। हमेशा जिंदा नहीं रहेगी। बड़ी-बड़ी फिल्में आई और चली गई।
